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नीलकंठ
July 14, 2020 • ✍️शिवानी • कविता
 
✍️शिवानी
दुनिया भर से मिला ज़हर 
अपने मन में समाए 
वो पड़ जाती है नीली और निस्तेज
और कहलाती है
नीलकंठ सी- परोपकारी और सहनशील...
जब कभी भर जाता है मन
तो बहाना चाहती है
कुछ ज़हर बाहर!
और तब अचानक ही
बदल जाते हैं संबोधन
कहलाती है ज़हरीली....
ज़ब्त किए रखना ज़हर
उसकी नियति है!!
वो ज़हर 
जो उसका अपना नहीं है
उंडेला जाता रहा है 
उसके हलक़ में जब-तब...
जब तक ह्रदय में संचित प्रेम
अक्षुण रहता है ज़हर से
भरपूर लुटाती है
पर कब तक बचाए संचित धन??
आमद न हो 
तो हर ख़ज़ाना 
खाली हो जाता है!!!
फिर वही हाथ आता है
जो ख़ज़ाने में भरा गया है!!
तो बढ़ती उम्र के साथ
अगर वो ज़हरीली हो रही है
तो ज़रा देखिए, जांचिए परखिए
कि क्या दिया है हमने उसे??
ज़हर ही ना!!!
*जयपुर
 

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