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नव संवत्सर का प्रारम्भ उगादि पर्व
March 23, 2020 • सरिता सुराणा • लेख

*सरिता सुराणा
उगादि या फिर जिसे नूतन सम्वत्सर युगादि के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण भारत का एक प्रमुख पर्व है। इसे कर्नाटक, आंध्र-प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में नववर्ष के रुप में मनाया जाता है। यह पर्व चैत्र माह के पहले दिन मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से यह पर्व मार्च या अप्रैल में आता है। दक्षिण भारत में इस पर्व को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है क्योंकि वसंत आगमन के साथ ही किसानों के लिए यह नयी फसल के आगमन की खुशी का पर्व भी होता है। 
 
क्यों मनाते हैं उगादि
उगादि के पर्व को लेकर कई सारी मान्यताएं प्रचलित हैं, ऐसी ही एक मान्यता के अनुसार शिवजी ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया था कि कहीं भी उनकी पूजा नहीं की जायेगी, लेकिन आंध्र-प्रदेश में उगादि के अवसर पर ब्रह्मा जी की ही पूजा की जाती है, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने ब्रह्मांड की रचना शुरु की थी। यही कारण है कि इस दिन को कन्नड़ तथा तेलुगु नववर्ष के रुप में भी मनाया जाता है। इसके साथ ही पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु मत्स्य अवतार में अवतरित हुए थे। ऐसा माना जाता है कि उगादि के दिन ही भगवान श्री राम का राज्याभिषेक हुआ था। इसके साथ ही इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी।
यदि सामान्य परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो उगादि का यह त्योहार उस समय आता है, जब हमारे देश में वसंत ऋतु अपने चरम पर होती है और इस समय किसानों को नयी फसल भी मिलती है। क्योंकि हमारा देश कृषि प्रधान देश है, इसलिए प्राचीन समय से ही किसानों द्वारा इस पर्व को नई फसल के लिए ईश्वर को दिये जाने वाले धन्यवाद के रुप में मनाया जाता है।
 
कैसे मनाते हैं 
चैत्र माह के पहले दिन से चैत्र नवरात्रि का आरंभ होता है, तो उसी दिन दक्षिण भारत के कर्नाटक, आंध्र-प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में उगादि नामक त्योहार मनाया जाता है।  इस दिन को लेकर लोगो में काफी उत्साह रहता है और इस दिन वे सुबह उठकर अपने घरों की साफ-सफाई में लग जाते हैं, उस के बाद अपने घरों के प्रवेश द्वार को आम के पत्तों से सजाते हैं। इसके साथ ही इस दिन एक विशेष पेय बनाने की भी प्रथा है, जिसे पच्चड़ी नाम से जाना जाता है। पच्चड़ी नामक यह पेय नई इमली, आम, नारियल, नीम के फूल, गुड़ जैसी चीजों को मिलाकर मटके में बनायी जाती है। लोगों द्वारा इस पेय को पीने के साथ ही आस-पड़ोस में भी बांटा जाता है। इस दिन कर्नाटक में पच्चड़ी के अलावा एक और चीज भी लोगों द्वारा खायी जाती है, जिसे बेवु-बेल्ला नाम से जाना जाता है। यह गुड़ और नीम के मिश्रण से बना होता है, जो हमें इस बात का ज्ञान कराता है कि जीवन में हमें मीठेपन तथा कड़वाहट भरे दोनों तरह के अनुभवों से गुजरना पड़ता है। इस मीठे-कड़वे मिश्रण को खाते वक्त लोगों द्वारा निम्नलिखित संस्कृत श्लोक का उच्चारण किया जाता है-
 
“शतायुर्वज्रदेहाय सर्वसंपत्कराय च ।
सर्वारिष्टविनाशाय निम्बकं दलभक्षणम् ॥”
उपरोक्त श्लोक का अर्थ है – “वर्षों तक जीवित रहने, मजबूत और स्वस्थ शरीर की प्राप्ति के लिए एवं विभिन्न प्रकार के धन की प्राप्ति तथा सभी प्रकार की नकारात्मकता का नाश करने के लिए हमें नीम के पत्तों को खाना चाहिए।” 
 
इसके साथ ही इस दिन घरों में पूरणपोली तथा लड्डू जैसे कई स्वादिष्ट व्यंजन बनाये जाते हैं। इस दिन लोग अपने आस-पास के लोगों को अपने घरों में खाने पर भी आमंत्रित करते हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इस अवसर पर बोवत्तु या फिर पोलेलु  नामक व्यंजन बनाया जाता है। इसी व्यंजन को तेलंगाना में बोरेलु नाम से जाना जाता है। यह एक प्रकार का पराठा होता है, जिसे चने की दाल, गेहूं के आटे, गुड़ और हल्दी आदि को पानी की सहायता से गूंथकर देशी घी में तलकर बनाया जाता है। इसको पच्चड़ी के साथ खाया जाता है।
 
उगादि की पूजा विधि 
उगादि के दिन पूजा-अर्चना करने की एक विशेष विधि है और इसका पालन करने से इस पर्व पर ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन सुबह उठकर नित्य कर्मों से निवृत होकर, अपने शरीर पर बेसन तथा तेल का उबटन लगाकर नहाना चाहिए। इसके बाद हाथ में गंध, अक्षत, फूल और जल लेकर भगवान ब्रह्मा जी के मंत्रों का उच्चारण करके पूजा करनी चाहिए। इसके साथ ही इस दिन घर में रंगोली या स्वास्तिक का चिह्न बनाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है। यदि इस दिन सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर हल्दी या केसर से रंगे अक्षत से अष्टदल बनाकर उस पर ब्रह्मा जी की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करके ब्रह्मा जी की पूजा की जाए तो उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
 
उगादि का महत्व
उगादि का यह पर्व हमें प्रकृति के और भी समीप ले जाने का कार्य करता है। क्योंकि यदि इस त्योहार के दौरान पिए जाने वाले पच्चड़ी नामक पेय पर गौर करें तो यह शरीर के लिए काफी स्वास्थ्यवर्धक होता है। जो कि हमारे शरीर को मौसम में हुए परिवर्तन से लड़ने के लिए तैयार करता है और हमारे शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को भी बढ़ाता है। इसके साथ ही ऐसी मान्यता है कि इस दिन कोई नया काम शुरु करने पर सफलता अवश्य मिलती है। इसलिए उगादि के दिन दक्षिण भारतीय राज्यों में लोग दुकानों का उद्घाटन, भवन निर्माण का आरंभ आदि नये कार्यों की शुरुआत करते हैं।
 
उगादि का इतिहास 
उगादि पर्व का इतिहास काफी प्राचीन है और इस त्योहार को कई शताब्दियों से दक्षिण भारत के राज्यों में मनाया जा रहा है। दक्षिण भारत में चंद्र पंचांग को मानने वाले लोगों द्वारा इसे नव वर्ष के रुप में मनाया जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि इस पर्व की शुरुआत सम्राट शालिवाहन या जिन्हें गौतमीपुत्र शतकर्णी के नाम से भी जाना जाता है, उनके शासनकाल में हुई थी। इसके साथ ही इस पर्व के दौरान वसंत ऋतु अपने पूरे चरम पर होती है, जिससे मौसम काफी सुहावना रहता है। उगादि वह पर्व है जो हमें इस बात का एहसास दिलाता है कि हमें अतीत को पीछे छोड़कर आने वाले भविष्य पर ध्यान देना चाहिए और किसी तरह की असफलता से निराश नहीं होना चाहिए बल्कि सकारात्मकता के साथ नयी शुरुआत करनी चाहिए।

*सरिता सुराणा,हैदराबाद

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