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नदी और चट्टान
November 6, 2019 • मीना अरोड़ा • कविता

*मीना अरोड़ा*
 
तुम चट्टान से
खड़े रहे
मैं नदी सी 
बह आयी
तुम्हें लांघते वक्त
मेरे अंदर का शोर
बाहर सबको सुनाई दिया
बस तुम्हीं न सुन पाए
मेरी आवाज़,मेरा दर्द
मेरा कराहना
तुम्हें छोड़ ज्यों ज्यों
आगे बढ़ती गयी
मेरा उफान, तूफान
शोर मचाना
सब खत्म हो गया
शायद तुम्हारे छूटते ही
 मुझसे सब छूट गया
मेरे अंदर भरा मीठा
प्रेम का प्याला
फूट गया
अब कुछ भी नहीं भाता
सबको लगता है
मुझे इश्क करना नहीं आता
मुझे प्रेम सिखाने को
हर कोई चला है आता
मैं सबसे बचके
सागर में जा समाती हूं
मैं ही तो हूं 
जो किनारे पर आ
लहर लहर हो जाती हूं
और तुम जैसी 
चट्टानों से आकर
फिर टकराती हूं
नहीं टूटती मुझसे चट्टान
फिर से टूट बिखर जाती हूं
तुम कभी नदी 
नहीं बन पाते
मैं चट्टान नहीं बन पाती हूं।।
 
*मीना अरोड़ा
 

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