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मुफ्त के बादाम
July 3, 2020 • बलजीत  सिंह • कविता

*बलजीत  सिंह

पतझड़- सावन बदल गये ,
मान -मर्यादा की कटी लगाम ।
मिलावटखोर भी वसूल रहे ,
देखो !  मनमर्जी के दाम ।।

चोर हो या भ्रष्ट अधिकारी ,
जनता पर ही चलाये आरी ।
सूरत भोली जैसे कबूतर ,
दें सीधे सवालों के उलटे उत्तर ।
बंदे हमेशा खाना चाहे ,
मुफ्त के बादाम ।।
मिलावटखोर भी वसूल रहे ,
देखो !  मनमर्जी के दाम ।।

कैसी शिक्षा कैसे संस्कार ,
चाकू की जगह चलाये तलवार ।
करके अपनों की जेबें खाली ,    
फिर मधुशाला में छलकाये प्याली ।
जीवन का उद्देश्य यही ,
बोलकर झूठ निकलवाओ काम ।।
मिलावटखोर भी वसूल रहे ,
देखो !  मनमर्जी के दाम ।।

झूठ-फरेब का लेकर सहारा ,
कहां जायेगा जग से न्यारा ।
इस कुदरत का कानून विचित्र ,
निकलेगी जान रह जायेगा चित्र ।
विषय-वासना की चाहत का,
बुरा होता है सदा अंजाम ।।
मिलावटखोर भी वसूल रहे ,
देखो !  मनमर्जी के दाम ।।

पतझड़- सावन बदल गये ,
मान -मर्यादा की कटी लगाम ।
मिलावटखोर भी वसूल रहे ,
देखो !  मनमर्जी के दाम ।।
 
*ग्राम / पोस्ट - राजपुरा  ( सिसाय )
जिला - हिसार  ( हरियाणा )

 

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