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मुक्तक
June 30, 2020 • अ कीर्ति वर्धन • कविता
*अ कीर्ति वर्धन
बचपन  की अठखेलियाँ , कब  कहीं  मोहताज  हैं,
बाधाओं  की  चिन्ताओं से, कब  कहीं  मोहताज है
आग मे भी हाथ डालें, पानी  से बचपन डरता नही,
साँप से खेलता है बचपन,  कब  कहीं मोहताज है?
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अहंकार  का  बोझ  जब , सिर   पर   चढने   लगा,
आदमी  को  आदमी  तब , कीड़े  सा  लगने  लगा|
ढोने  लगा  वह  बोझ अपना, अपने कांधो पर यहाँ,
आदमी से आदमियत का, अहसास भी घटने लगा|
*मुजफ्फरनगर
 

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