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मृत्यु और भारतीय जनमानस
September 7, 2020 • ✍️प्रफुल्ल सिंह 'बेचैन कलम' • लेख

✍️प्रफुल्ल सिंह 'बेचैन कलम'
 
एक अजनबी वायरस द्वारा फैलाए हुए आतंक के कारण कई हफ़्तों तक घर में बंद रहने के बाद बीते कुछ समय से शाम को सैर के लिए बाहर निकलने लगा हूं। कभी घर के पास बने हुए डैम का एक चक्कर लगाकर ही ख़ुशी-ख़ुशी लौट आता हूं, तो कभी बेकल मन के साथ पलाश के झुरमुटों से अटी हुई ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों से होकर मीलों दूर बसे किसी पहाड़ तक का रास्ता नाप आता हूं। 
 
एक दिन मुझे लगा कि आज शाम किसी नदी की ओर निकलना चाहिए। मेरे पास मुख्यतया दो विकल्प थे। मैं अपने शहर की आश्रयदायिनी कोयल नदी की ओर जा सकता था, जिसके घाट पर बनी सीढ़ियों पर बैठकर शाहपुर के किले की ध्वस्त हो चुकी दीवारें भी दिखती हैं, गढ़वा रोड ब्रिज पर सरपट दौड़ती आधुनिक गाड़ियों की लंबी कतार भी नज़र जाती है, पूर्वडीहा और आसपास के गांवों से ख़रीदारी करने के लिए पैदल बाज़ार जाते हुए लोगों का रेला भी देखने को मिलता है।
 
इसके विपरीत, अगर मैं शहर की बाहरी सीमा को छूकर गुज़रने वाली, झारखंड की प्रधान नदियों में शामिल अमानत नदी की ओर जाता, तो मुझे मीलों दूर तक फैले रेत और पानी के साम्राज्य के अलावा कुछ विशेष दिखाई नहीं देता। उस ओर जीवन अभी इतनी आपाधापी से भरा हुआ नहीं है। यातायात के नाम पर इक्का-दुक्का सार्वजनिक वाहन और अवैध तरीके से या ऐसे कहें कि चोरी से बालू उठाकर ले जाने वाले कुछ ट्रैक्टर मिल सकते हैं। 
 
मैंने अमानत नदी की ओर जाने का फ़ैसला किया। लगभग तीन मील पैदल चलने के बाद मैं अमानत के किनारे आ पहुंचा था। नदी अभी अपने चरम पर नहीं थी। कोई आधे मील चौड़े पाट का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रेत से घिरा हुआ दिख रहा था। बिना आवाज़ किए बहती धारा को देखकर मालूम पड़ता था कि पानी अभी बहुत गहरा नहीं है। सामने एक पुल बना हुआ था, जिसे पार करके हम नानी के गांव जाते हैं। मुझे याद आया, बचपन में इस पुल के न होने पर बरसात में बड़ी मुश्किल होती थी। हालांकि गर्मियों में तो पानी इतना सूख जाता था कि पैदल ही पार हो जाओ। 
 
मैं उस पुल से नदी को देखना चाहता था। वहां पहुंचने के बाद मैंने देखा कि नीचे कुछ बच्चे रेत पर क्रिकेट खेल रहे हैं। मुझे हैरत भी हुई कि रेत पर तो गेंद उछलती नहीं है और थोड़ी दूर पर मैदान मिल भी सकता है, फिर यहां खेलने की क्या ज़रूरत है! लेकिन फिर बचपन का मतलब भी क्या रह जाएगा, मैंने ही सोचा। हम भी तो स्कूल की छुट्टी के समय बरसात होने पर क्रिकेट खेलने लग जाते थे। सारे टीचर आकर कहते कि फुटबॉल खेल लो, लेकिन हमें क्रिकेट खेलना था तो बस खेलना था। 
 
फिर मैं दूसरी ओर मुड़ा। उस तरफ़ किसी की चिता जल रही थी। शायद पास के गांव से कोई होगा। वरना मैंने तो नहीं सुना कि मेरे शहर से यहां कोई शवदाह के लिए आता हो। मैं थोड़ी देर तक चिता को जलते हुए देखता रहा। फिर बच्चों की आवाज़ से मेरा ध्यान बंटा। मैंने पलटकर देखा, बच्चे अपने खेल में तल्लीन थे। चिता से उनकी दूरी सौ गज से अधिक नहीं रही होगी। मैं आश्चर्य में तो नहीं था, लेकिन समझना चाह रहा था कि ये बच्चे एक मर चुके आदमी को जलाए जाते देखकर भी इतने अप्रभावित कैसे हैं।
 
मैं पुल से उतरकर एक ऐसी जगह बैठ गया, जहां से मुझे दोनों दृश्य एक साथ दिखाई दे रहे थे। एक तरफ़ कलरव, दूसरी तरफ़ रूदन। एक ओर मृत्यु का सन्नाटा, दूसरी ओर जीवन का उत्साहपूर्ण संगीत। मुझे अचानक जयपुर के प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री नंदकिशोर आचार्य जी का स्मरण हो आया। वरिष्ठ पत्रकार श्री गोपाल शर्मा की जिस पुस्तक के लिए मैंने शोधकार्य किया था, उसके लोकार्पण कार्यक्रम में मुझे आचार्य जी से मिलने का अवसर मिला था। मेरे मन में उनके प्रति जो श्रध्दा है, उसका एक प्रमुख कारण मृत्यु के बारे में दिए गए उनके वक्तव्य हैं। 
 
आचार्य जी ने कहा था कि भारत में मृत्यु के विषय में जो दर्शन विकसित हुआ, वह पश्चिमी देशों के दर्शन के ठीक विपरीत है। हमारे यहां लोकाचार में जिस तरह की चर्चाएं होती हैं, उनके परिणामस्वरूप मृत्यु हमारे लिए कोई त्रासदी नहीं रह जाती। पश्चिम के दर्शन में मृत्यु एक भयकारक स्थिति है, जबकि भारत में उसे बड़ी सरलता से एक अटल सत्य मान लिया जाता है। कि जो कुछ पैदा हुआ है, वह एक दिन समाप्त हो जाएगा, यही नियति है। पश्चिम का दर्शन मृत्यु से भागने का भाव पैदा करता है, जबकि भारत में मृत्यु सहज स्वीकार्य है। 
 
मुझे ऐसा लगा कि लंबे समय तक आचार्य जी से प्रभावित रहने के बावजूद उनकी बातें पहली बार समझ पा रहा हूं। मैंने अनुभव किया कि आत्मा, पुनर्जन्म, मोक्ष जैसे सिद्धांत वास्तव में भारतीय चेतना को एक नया आयाम देते हैं और उसे मृत्यु के भय से मुक्त करते हैं।मुझे समाज में इस विषय पर होने वाले अनौपचारिक संवाद की कई झलकियां याद आने लगीं। मुझे याद आया कि कैसे जब कोई वृद्ध व्यक्ति प्राकृतिक मृत्यु को उपलब्ध होता है, तो ढोल-शंख आदि बजाए जाते हैं, एक प्रकार का उत्सव मनाया जाता है। 
 
हम मृत्यु को सद्गति का नाम देते हैं या परलोकगमन कहते हैं या कहते हैं कि अमुक व्यक्ति ने देह त्याग दी। अर्थात् इस तथ्य में हमारी बड़ी प्रगाढ़ आस्था है कि मनुष्य का अस्तित्व शत-प्रतिशत समाप्त नहीं हो गया। हम इसे ऊर्जा के रूपांतरण की तरह देखते हैं। कि कल वह किसी और रूप में था, आज किसी और रूप में ढल गया। किसी अन्य ही अवस्था को प्राप्त हो गया। किंतु पूर्णतया नष्ट ही नहीं हो गया। ऐसा नहीं कि अब कुछ शेष ही न रहा। 
 
मुझे आभास हुआ कि यह एक बड़ी गहरी वैज्ञानिक दृष्टि है, जो इस प्राचीन देश ने अपने जनमानस में स्थापित की है। सच ही तो है! एक परमाणु से आरंभ हुए इस ब्रह्मांड में जब तक एक परमाणु शेष रह जाता है, तब तक कुछ भी नष्ट कहां हुआ! तब तक किसी भी मृत्यु को मृत्यु कैसे कहा जाए!
 
सांझ ढलने लगी थी। शव जलाने आए हुए लोग अपने घर की ओर लौटने लगे थे। बच्चों को भी अब गेंद ठीक से दिखाई नहीं पड़ रही थी। उन्होंने भी अपना साज़ो-सामान उठा लिया। मैं भी दिन भर भटके पंछी की तरह अपने नीड़ में लौटने की तैयारी करने लगा।
 
*लखनऊ, उत्तर प्रदेश
 

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