ALL कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
मोबाइल के लालची, आज बाल गोपाल
November 19, 2019 • शिव कुमार 'दीपक' • दोहा/छंद/हायकु


*शिव कुमार 'दीपक'*

माखन के वे दिन कहां, कहां नंद के लाल । 

मोबाइल  के लालची, आज बाल गोपाल ।‌‌।            

आज बाल गोपाल, दही माखन  को भूले ।     

मोबाइल में गेम, गीत  सुन सुनकर फूले ।।          

गुटका पान पराग, शौक उनके बचपन के ।                 

'दीपक'आते याद,दिवस मिश्री माखन के ।। -1


'होरी' आया शहर में, हुआ गांव  से तंग ।               

काम कोठियों में मिला, पोत रहा है रंग ।।          

पोत रहा  है रंग, साथ  बेटा गोबर है ।                    

सोने को फुटपाथ, ओढ़ने को चादर है ।।               

हाथ बटाती रोज, साथ पत्नी  है भोरी ।               

सबने पाया काम,शहर में खुश है होरी ।।- 2  


समता की सौहार्द की, बड़ी जरूरत आज ।             

धर्म-द्वेष की आग में, जलने लगा समाज ।।            

जलने लगा समाज, आग  बढ़ती जाती है ।             

घूम  रहे बेखौफ, जिन्हें  हिंसा भाती है ।।                

पड़ी, संत रैदास , तुम्हारी आवश्यकता ।                 

हमें  चाहिए प्रेम , और आपस में समता ।।-3


घर का मुखिया हो अगर, दीन-हीन कमजोर ।            

या  फिर दारूबाज  हो , या हो सट्टाखोर ।।                

या हो सट्टाखोर , कबाबी और जुआरी ।               

कैसे  वह परिवार,  कहा जाए संस्कारी ।।              

वह  बेचारा  पात्र , नहीं  होता आदर का ।             

मुखिया से माहौल, बिगड़ जाता है घर का ।।-4


तोते  सारे बाग  के , माली रहा  उड़ाय ।                    

दो पग वाले बैठ कर, रहे फलों को खाय ।।          

रहे फलों को खाय,न कोई उनको खटका ।        

माली  है बेभान,  इन्हीं तोतों  में अटका ।।            

उजड़ेगा यह बाग, इन्हीं चोरों  के होते ।             

माली अब तो चेत , उड़ा मत केबल तोते ।।-5                           


घर आए आनंद से, मत नाहक मुख मोड़ ।        

अन्न मिला है भाग्य से,थाली में मत छोड़ ।।     

थाली में मत छोड़ , अन्न  जीवन देता है ।           

क्रोध रोष को रोक, ज्ञान को हर लेता है ।।           

रहे  धीर गंभीर , सही  निर्णय ले पाए ‌।            

अमन-चैन सुख-प्रेम,स्वतःउसके घर आए ।।-6


करिए हर कोशिश यही, टले रार तकरार ।         

हँसी-खुशी पलती रहे, रहे दिलों में प्यार ।।            

रहे दिलों में प्यार,थाम कर चलिए उंगली ।             

हँसो, उठेंगीं साथ , रोइए, होगी एकली ।।               

दुख देता एकांत ,जमाने का दुख हरिए ।                  

रहे जमाना साथ, काम ऐसे ही  करिए ।।-7


सोतीं भूखी आज भी, कई करोड़ों जान ।            

मगर उन्हीं के पास है,  बचा हुआ ईमान ।।               

बचा हुआ ईमान, और सब कुछ खोया है ।     

मेहनतकश  इंसान , गरीबी  में रोया है ।।              

संसद में भरपेट , भूख  पर चर्चा होतीं ।            

'दीपक' फिर भी देख,जिंदगी भूखी सोतीं ।।-8  


रोटी कपड़ा हो न हो, ना हो भले मकान ।          

खड़े धर्म  के नाम पर, बंदूकों  को तान ।।       

बंदूकों  को तान, विरुद्ध खड़े भारत के ।          

गंवा  रहे हैं जान, ख्वाब पाले जन्नत के ।।         

'दीपक' पाकिस्तान,चल रहा चालें खोटी ।           

बांट  रहा बंदूक,   नहीं खाने को रोटी ।।-9       


हारा वह जिसके यहां ,था  कोई गद्दार ।                 

घर के भेदी ने किए,  घर के बंटाढार ।।                    

घर के बंटाढार , किए  घर के लोगों ने ।                

दिए उन्हींने भेद, सहे अन्याय जिन्होंने ।।   

'दीपक' खुफिया तंत्र,जहां चौकस था सारा ।          

साक्षी है इतिहास, कभी वह जंग ना हारा ।।-10           


सुंदर हो मधु गंध हो,खींचे सबका ध्यान ‌ ।           

माली  ऐसे फूल  को , देता है  सम्मान ।।              

देता है सम्मान, योग्यता को  कोई भी ।                 

शोभा बनते फूल,   मूर्ति मंडप अर्थी की ।।         

देगा 'दीपक' छोड़ ,फूल में अगर कसर हो ।  

चुना गया वह फूल , गंध जिसकी सुंदर हो।।-11


लंकापति को आज तक, मार न पाए राम ।          

उठा-उठा सिर दीखता, यहां वहां हर ठाम ।।        

यहां वहां हर ठाम ,  रूप रावण के दिखते ।  

कवि लेखक हर वर्ष,जल गया रावण, लिखते ।।  

'दीपक'  बारंबार ,  यही होती है  शंका ।     

किस रावण को मार, राम ने जीती लंका ।।-12


मानवता रोती रही,  सहे नियति के डंक ।         

पलता रहा समाज में, अनाचार आतंक ।।  

अनाचार आतंक , बढ़ा तब लोग लड़े हैं ।                

अब भी उनका जोश, हौसले बढ़े चढ़े हैं ।।    

दीपक अपने पास, करो पैदा वह क्षमता ।    

डर का  होवे अंत, फले  फूले मानवता ।।-13 


पाले थे क्यों आपने, आस्तीन  के सांप ‌ ।    

काट लिया तो आपकी,  रूह गई है कांप ।।        

रूह  गई है  कांप, डरे  हो , पछताते हो ।           

पालोगे अब श्वान, हमें क्यों  बतलाते हो ।।

'दीपक' होते ठीक, श्वान फिर भी रखवाले ।  

सहता  है खुद डंक, सांप जिसने हों पाले ।।-14


माटी का दीपक बना, बाती जिसके प्राण ।      

स्नेह जल रहा उम्र का,लौ जिसकी मुस्कान ।।   

लौ जिसकी मुस्कान,सुखद आलोक लुटाती ।       

खर्च रही है कोष,    सांस हर आती जाती ।। 

दीपक ही है श्रेष्ठ, दीप्ति  जिसकी परिपाटी ।

प्रतिफल  दिव्यप्रकाश,  शेष है, सो है माटी ।।-15


*शिव कुमार 'दीपक',बहरदोई, सादाबाद,हाथरस (उ० प्र०)मो- 8126338096

Email-kavishivkumardeepak@gmail.com

 

शब्द प्रवाह में प्रकाशित आलेख/रचना/समाचार पर आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया का स्वागत है-

अपने विचार भेजने के लिए मेल करे- shabdpravah.ujjain@gmail.com

या whatsapp करे 09406649733