ALL कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
मेरी लॅाक डाउन डायरी
July 12, 2020 •  आशीष 'बल्लम' • व्यंग्य
*आशीष 'बल्लम'
लॅाक डाउन के बीच जब जेठ का महीना चल रहा था तब ऐसा लगने लगा था कि जरूरी नही है कि हर खांसता और थूकता हुआ मानव कोरोना पीडित हो या उसको कोरोना हुआ हो।
हमारे सभ्य भारत की सभ्यता है कि अगर जेठ घर के अंदर प्रवेश करता है तो वह जानबूझकर खांसते हुए प्रवेश करता है कि बहु अपने आप को सचेत कर ले या फिर अपने सिर को ढांक ले । लेकिन वाह रे कोरोना तेरी माया कंही धूप कहीं छाया और तूने तो जेठ के कारण मिलाजुला असर छोड दिया महिलाऐं तो महिलांऐ तूने तो पुरूषों को भी अपना सिर और मुंह ढांकने पर मजबूर कर दिया है ।
हमारे सभ्य भारत की सभ्यता है कि अगर जेठ घर के अंदर प्रवेश करता है तो वह जानबूझकर खांसते हुए प्रवेश करता है कि बहु अपने आप को सचेत कर ले या फिर अपने सिर को ढांक ले । लेकिन वाह रे कोरोना तेरी माया कंही धूप कहीं छाया और तूने तो जेठ के कारण मिलाजुला असर छोड दिया महिलाऐं तो महिलांऐ तूने तो पुरूषों को भी अपना सिर और मुंह ढांकने पर मजबूर कर दिया है ।
लॅाक डाउन के बीच नंबर डायल करते ही खांसी की आवाज सुनकर मालवा के गांवों की महिलाओं ने अपना मोबाईल फोन अपने पति को पकडाना चालू कर दिया है “ल्यो तम बात करो फोन जेठ जी ने उठायो है“।
लॅाक डाउन के दौरान घर में रहने का यह असर हुआ पत्नी को भी पति से अग्नि परीक्षा लेने का मौका मिल ही गया और उस पर अमल करते हुए पत्नी ने आईने के सामने में अपने आप को चारों ऐंगल से निहारते हुए अपने पति से पूछा “डार्लिंग मैं जरा सी ज्यादा मोटी हो गई हूं क्या ?। पति के तो यह सून के हाथ पैर ही फूल गये, पसीना छूट गया लेकिन उम्मीद का एक रास्ता भी नजर आया और वह रास्ता था हर भारतीय आज्ञाकारी पत्नीव्रता पति का वैवाहिक जीवन में जानबूझकर और मजबूरी में बोला जाने वाला “एक झूठ“ जो लगभग को मरने के बाद हर पति को नरक की आग में झोंकेगा । तो पति ने यहां पर यह सोच कर की सुबह सुबह कौन झगडे झांसे का टंटा पाले चेहरे पर बनावटी खुशी लाते हुए बोला “ना मेरी जान बिलकुल भी मोटी नही हुई हो बल्कि अब तो तुम्हारी कमर से तुम जीरो फिगर की लग रही हो“ । पति को अपना यह झूठ कितना भारी पडने वाला था यह अंदेशा नहीं था । अपनी जीरो फिगर वाली तारीफ सुन पत्नी मचल उठी “अच्छा तो मैं इतनी पतली हो गई हूं ना तो चलो मुझे अपनी प्यार भरी बाहों में उठाकर फ्रिज के पास लेकर चलो मेरे को अभी लस्सी पीनी है“ । इतना सुनते ही पति को लगा जैसे उसकी आंते बाहर आ गई हो । कोरोना की अनियंत्रित स्थिती को लेकर जो  तैयारी सरकार की है बस वही लाचारी पति की हो गई । स्थिती को अनियंत्रित होते देख पति बोला “अरे मेरी जान तुम्हारे लिए तो मैं चांद तारे तोड कर ला सकता हूं तो यह फ्रिज उठाकर नहीं ला सकता हूं क्या, ? रूको मैं फ्रिज ही उठा कर लाता हूं“। तो ये साइड इफेक्ट भी सामने आ रहे हैं लॅाक डाउन के ।
आज मेरे बेटे ने अखबार पढते हुए बोला “डैडी ये सरकार कुछ जानती हो या ना जानती हो पर मेरे को समझ आ गया है कि यह लोगों को उल्लु बनाना जरूर जानती है“ । मैं चौंका मुझे सुबह सुबह इतनी ज्ञान की बातें सुनने  की उससे उम्मीद नहीं थी । मैने पूछा यह कैसे बोल सकता है तू ? तो वह बोला एैसा है कि सरकार के पास कोरोना वायरस से निपटने के पर्याप्त संसाधन तो है नहीं तो वह जनता को फुसलाती है कि ताली थाली ठोबरे ठक्कन बजाओ तो ठक्कन लोग भावुक होकर बजाने लगते हैं । सरकार फिर फुसलाती है कि रात को बिजली बंद करके दिया टॉर्च मोबाईल की फलैश लाईट जलाओ तो कोरोना वारयर्स का उत्साहवर्धन होगा। मैं बोलता हूं इतनी चिंता है तो क्यों नही पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराती है सरकार । मै निरूतर । वो फिर ज्ञानचंद बन गया  अब देखो एक नया रगडा लेकर आई है सरकार की कोरोना संक्रमित इलाकों को तीन जोन में बांट दिया है और इतनी लंबी चौडी गाइड लाईन के साथ की आधा अखबार का पन्ना उसी गाइड लाईन से भर गया है । इस देश में जहां साक्षरता के नाम पर कई लोंगों को केवल अपना नाम लिखना आता है वहां इतनी लंबी चौडी गाईड लाईन पढेगा कौन और पढता कौन है । रेड ऑरेंज ग्रीन जोन को आसानी से समझाने की जगह कॅाम्पलीकेटेड कर के रखा हुआ है । मैने पूछा कैसे वो बोला रेड ऑरेंज ग्रीन जोन को एैसे समझो
ग्रीन जोनः  घर के बाहर तफरीह करते पाए जाने पर देखकर भी पुलिस अनदेखा करे तो आसानी से समझ जाओ की ग्रीन जोन है ।
ऑरेंज जोनः  घर के बाहर तफरीह करते पाए जाने पर देखकर पुलिस 2 या 4 गाली देकर हडकाये और छोड दे तो आसानी से समझ जाओ की ऑरेंज जोन  है ।
रेड जोनः  घर के बाहर तफरीह करते पाए जाने पर देखकर पुलिस 2 या 4 गाली के साथ हडकाये और मार मार कर पिछवाडा सुजा दे तो रेड जोन है । सच बताउं खुशी के आंसु आ गए आंखों में ।
आज सरकार ने शराब की दुकानों को खोल दिया । शराब की दुकानें खुलने से यह बात समझ में आयी की आदमी कोरोना से भले ही ना मरे लेकिन अगर शराब की दुकान ना खुली तो सरकार की जान जाना पक्का है । उपर से किसी का बचकाना बयान की ”दम तोडती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए शराब की दुकान खोली गई हैं। किसी बेवडे ने यह सुन लिया । यहां बेवडा इसलिए कहा है क्योकि हमारे देश में शराब पीने वाले को भी विभिन्न श्रेणीयों में बांट कर रखा गया है । अमीरों की पार्टीयों में पीना उसे सभ्यता से ड्रिंक्स कहा जाता है । मध्यम लोगों के बीच उसे थकान उतारना कहा जाता है और गरीब वर्ग उसे पी ले तो उसे बेवडा कहा जाता है  । तो बात यह हुई की उसे बेवडा कहने से वो भडक गया और बोला बेवडा मत बोलना देश की अर्थव्यवस्था का कर्णधार हूं।
ताजा ताजा बयान किसी पढे लिखें गंवार ने दे दिया की एक सौ तीस करोड की आबादी की कोरोना जांच असंभव है बस फिर एक बेवडा भडक तो गया लेकिन बोला बडी ही सटीक बात अच्छा एक सौ तीस करोड की आबादी की जांच संभव नही है मगर एनआरसी संभव है जिसके लिए कानून पास करके ले आये । वाह कोरोना वाह ।
*छिन्दवाडा (म॰प्र॰)
 

अपने विचार/रचना आप भी हमें मेल कर सकते है- shabdpravah.ujjain@gmail.com पर।

साहित्य, कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी लेख/रचनाएँ/समाचार अब नये वेब पोर्टल  शाश्वत सृजन पर देखेhttp://shashwatsrijan.com

यूटूयुब चैनल देखें और सब्सक्राइब करे- https://www.youtube.com/channel/UCpRyX9VM7WEY39QytlBjZiw