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मेघा बरसो...
August 3, 2020 • ✍️व्यग्र पाण्डे  • गीत/गजल
✍️व्यग्र पाण्डे 
 
           बरसो-बरसो मेघा बरसो,
           हो गये वर्षों बिन बरसे 
तपती धरती आहें भरती, हर पल बूँदों को तरसे ।
 
         नग्न गिरि, बीमार हैं नदियां 
         कूप पियासे आजा छलिया
         झरने मूक सिसकियाँ भरते  
         भर दे अब प्रकृति की डलिया 
         कर ले नेक काम निज कर से
बरसो-बरसो मेघा बरसो, हो गये वर्षों बिन बरसे ।
 
         मेघ घटाओं के संग आना 
        और चपल बिजली चमकाना 
         करना  तरबतर  सृष्टि  को
         वृष्टि   तू   ऐसी   बरसाना
         जिससे जन-जन का मन हरषे 
बरसो-बरसो, मेघा बरसो, हो गये वर्षों बिन बरसे ।

         रीत चला सावन मनभावन 
         तुम  ना बरसे  मेरे  आंगन 
         मैं  विरहन  वाट  जोहती 
         संगत तोहरी बिगड़े साजन
         मनवा कब से मोरा तरसे   
बरसो-बरसो मेघा बरसो, हो गये वर्षों बिन बरसे ।
 
*गंगापुर सिटी, स.मा.(राज.)
 

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