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मीन और नारी
August 27, 2020 • ✍️प्रेम बजाज • कविता

✍️प्रेम बजाज

मैं भी हूं
मीन सी प्यासी,
जल- जीवन मीन का
मेरा जीवन प्यार रे ।
सुन्दर मीन को
सब कोई चाहे
ना हो रूप तो
ना पूछे संसार रे ।
 
अज़ाब-ए-तन्हाई कभी सहती तो
कभी रौनकें- महफ़िल बन जाती नारी ।
कभी करूं तकरार तो मानी जाती बेमानी,
रहूं चुप तो है कद्रदानी ।
दी ग़र कभी सदा तो नाकाम लौट आई,
अहले-जहां को रहती ना ख़बर हमारी ।
बंट  गए टुकड़े सारे
कुछ ना बचा अब बाकी है ,
ज़िन्दगी भी अब अपनी 
नहीं पराई सी लगने लगी है हमारी ।
 
कितनी दूर निकल आए हम
अब रहा ना कोई अरमान है,
वो सब जो लाए थे  साथ, 
खो  गया साजो-सामान है ।
लौट जाऊं वापिस अब ये मुमकिन नहीं ,
ढुंढने को घर वापिस
मेरे नक्श्पां भी तो नहीं ।
मछली जल की रानी ,
नारी घर की रानी ,
कभी बने सजावट का 
टुकड़ा, कभी दबाई जाए रे ,
कभी ये कुचली जाए रे, 
हाए रे मीन और नारी
एक सा कर्म लिखाए रे  । 
मैं  भी हूं मीन सी प्यासी 
जल बनता मीन का जीवन ,
मेरा जीवन प्यार रे .....
 
*जगाधरी ( यमुनानगर ) 
 

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