ALL कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
मज़दूर
May 2, 2020 • शुचि 'भवि' • कहानी/लघुकथा

*शुचि 'भवि'

मम्मी ये देखो, कितना सामान भर रहे हैं ये लोग।तीन बोरे, दो  पेटी, चार पुट्ठे के डब्बे, और ये साइकिल भी। आप तो कहती हो ट्रैन में कम सामान लेकर चलना चाहिए।अब इनको कुछ नहीं कहोगी आप। पूरा रास्ता ही बंद कर दिया है।दरवाज़े तक अब जाएँगे कैसे और उतरेंगे कैसे। दिया ने चिंतित स्वर में माँ से पूछा।पुष्कर भी बेटी की बातें सुन हँस रहे थे।उन्होंने दिया का हाथ पकड़ा और ट्रेन के दरवाज़े की तरफ़ चल पड़े। वहाँ पहुँच उन्होंने रौबदार मूँछों वाले आदमी से पूछा, कहाँ जा रहे हो भाई?हाथ जोड़ वो बोल पड़ा, बिहार के हैं हम और अब यहाँ का काम ख़त्म तो वापस जा रहे हैं, अपना कोई घर तो है नहीं, जिसका मकान बनाते हैं वो ही हमारा घर होता है मालिक के आने तक।मज़दूरी और चौकीदारी दोनों ही करते हैं साहब।
ये मेरी बेटी दिया है, आपका सामान देखकर आश्चर्य चकित है कि इतना सामान तो हमें ट्रैन में मम्मी ले कर चलने नहीं देतीं  वरना ये भी अपने सभी खिलौने रख ली होती। 
मेरा नाम मोहन है और ये पत्नी सावित्री है।मेरी तीन बेटियाँ और दो बेटे हैं।हम सभी का बस ये पूरा सामान है।इन बोरों में बर्तन, अनाज, बच्चों के खिलौने,किताबें,कुछ अन्य ज़रूरी सामान है।दो पेटियों में हमारे कपड़े हैं और ये साइकिल मेरी है।यही हमारा पूरा संसार है।हमारा कोई घर नहीं गुड़िया इसलिए सामान कहाँ रखें हम, ताला भी कहाँ लगाएँ, और वापस भी किस जगह जाएँ, पूरा साथ लेकर चले हैं इसलिए। बिहार में अपने गाँव के बस स्टेंड के पास रुक जाएँगे, और फिर जब काम मिलेगा तो यही सामान लेकर काम पर चले जायेंगे।हम मज़दूर बस ऐसे ही मजबूर होते हैं गुड़िया। 
दिया अपने पापा का हाथ खींचकर बोली मम्मी के पास जाना है।
मम्मी मज़दूर क्या होता है? वो हमारे जैसे क्यों नहीं होते? मेरे लिए तो घर में दो कमरे हैं, एक खेलने का, एक सोने का।इनके पास तो एक भी कमरा नहीं?ये सोते कहाँ होंगे। हम सब एक जैसे क्यों नहीं? आप तो कहती थी हम सब को ईश्वर ने एक जैसा बनाया है, फिर ये अलग क्यों? 
छोटी सी दिया के मन के अनगिनत सवाल का उत्तर क्या देतीं मम्मी। उन्होंने बैग खोला, बिस्किट का एक पैकेट, कुछ चॉकलेट, फल, और दिया के दो फ्रॉक, पुष्कर की एक पैंट-शर्ट, अपनी एक साड़ी निकाली, सब कुछ एक थैली में डाल कर दिया को देते हुए बोलीं, जाओ पापा के साथ जाकर उन्हें दे आओ।जहाँ तुम्हें लगे कि ईश्वर ने एक जैसा क्यों नहीं बनाया वहाँ तुम कोशिश कर लो अपनी तरफ से थोड़ी। दिया मम्मी के गले पर झूल गयी और उनके गालों को चूम ली।
 
*शुचि 'भवि'
भिलाई, छत्तीसगढ़
 

साहित्य, कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी लेख/रचनाएँ/समाचार अब नये वेब पोर्टल  शाश्वत सृजन पर देखेhttp://shashwatsrijan.comयूटूयुब चैनल देखें और सब्सक्राइब करे- https://www.youtube.com/channel/UCpRyX9VM7WEY39QytlBjZiw