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ममता की मूरत है मां
May 8, 2020 • सुनील कुमार माथुर • लेख

*सुनील कुमार माथुर
 
मां शब्द ही ममता की मूर्त का दूसरा नाम है । मां जैसा इस दुनियां में दूसरा कोई नहीं है । वह अपने बच्चों के लिए नाना प्रकार के दुःख सहन कर लेगी । मगर अपने बच्चों को कभी भी दुःखी नहीं देख सकती । अगर उसके दिव्यांग बच्चा होगा तो भी वह उसे उतना ही प्यार , स्नेह , ममता व वात्सल्य देगी जितना दूसरे बच्चों को देती है । वह अपनी संतान में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती है । यही वजह है कि मां की तुलना हम किसी से नहीं कर सकते । मां शब्द ही ममता की मूर्त है । तभी तो शास्त्रों में नारी को देवी स्वरूपा कहा गया है
मां के नाना प्रकार के रिश्ते है । वह किसी की माता है । किसी कि पत्नी । किसी कि बहन, किसी की मामी , किसी कि चाची ,किसी कि नानी , किसी कि दादी , किसी कि बेटी , किसी कि भाभी, किसी कि ननन्द , किसी कि देरानी जेठानी । मगर इन तमाम रिश्ते में मां का अपनी संतान के प्रति जो रिश्ता है वह पक्का व मजबूत रिश्ता है । मां को संतान कितने भी दुःख दे मगर वह कभी भी उफ तक नहीं करती है यही उसकी महानता है । तभी तो कहा गया है कि मां के चरणों में ही चारों धाम है । अगर आपने अपने माता पिता की निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो फिर आपको किसी भी तीर्थस्थल पर जाने की आवश्यकता नहीं है ।
मां बाप का हम पर जो ऋण है उसे हम कभी भी नहीं उतार सकते । भले ही हम कितने भी जन्म क्यों न ले ले हम देख रहे है कि एक माता पिता आठ आठ बच्चों को पालपोष कर बडा किया, पढाया लिखाया योग्य नागरिक बनाया, रोजगार कर पैसे कमाने योग्य बनाया । मगर आज एक बेटा अपने माता पिता की सेवा नहीं कर रहा है । वह उन्हें बोझ समझ रहा है और उनकी सेवा करने के बजाय उन्हें वृध्दावस्था में वृध्दाआश्रम में छोड रहा है जबकि आज उन्हें अपने बेटे के सहारे की जरूरत है । अपने बच्चों के संग रहने की जरूरत है ।
मगर भौतिक सुख सुविधाओं के चलते वे चारों ओर के भौतिक सुखों में इतने खो गये है कि माता पिता भी इन्हें बोझ लगने लगे हैं । जो एक दुखद व शर्मनाक बात है । मां के आशीर्वाद से ही हम फले फूले है तो फिर उनकी उपेक्षा क्यों? प्राचीन काल में जब साधनों का अभाव था तब श्रवण कुमार ने अपने अंधे व वृध्द माता पिता को कांवड में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई और आज हम साधन सम्पन्न होते हुए भी उनकी उपेक्षा कर नर्क के भागीदार बन रहे है ।
आज समय की यही मांग है कि हम अपने वृध्द माता पिता की निःस्वार्थ भाव से सेवा करें और अपने लिए मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करें । जब हमें यह मानव जीवन मिला है तो क्यों न हम माता पिता की सेवा कर इस पुण्य का लाभ कमाये । एक मां अपने बच्चों को सदैव आशीर्वाद ही देती है न कि बददुआ । भले ही औलाद नालायक क्यों न निकल जाये । मां के मुख से उसके लिए भी सदैव दुआ ही निकलती है ।
मां की सेवा निस्वार्थ भाव से कीजिए और इस धरा पर ही स्वर्ग का आनंद उठाये । मां के आशीर्वाद में जितनी शक्ति है उतनी किसी ओर में नहीं । मां तो मां ही होती हैं । मां क्या होती है उन लोगों से पूछिये जिनकी मां उनके बचपन में ही इस लोक से परलोक सिधार गई । मां की महिमा बडी ही कल्याणकारी है जिसने भी माता पिता की नि स्वार्थ भाव से सेवा की है वे लोग धन्य हो गये है चूंकि मां का आशीर्वाद कभी भी खाली नहीं जाता है वह सदैव फलता फूलता ही है और उसकी ही संतान नहीं अपितु मां ने जिसको भी आशीर्वाद दिया उसका भला ही हुआ । जिसके पास मां है वह बहुत भाग्यशाली है । धनवान है । किस्मत वाला है । अतः मां की इज्जत कीजिए । उसकी सेवा कीजिए । मां के त्याग व बलिदान को हम शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते । मां के चरणों में ही चारों धाम है ।
 
*सुनील कुमार माथुर,जोधपुर राजस्थान 
 
 

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