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मजदूरिन
May 1, 2020 • रामगोपाल राही • कविता

*रामगोपाल राही

खुशी खुशी नित आती जाती  ,
ईट भट्टों पर मजदूरिन  |
दिन भर ईट बनाती रहती ,
तन्मय होकर  मजदूरिन  ||

गार के जैसे  गार, हो रही
लिपटी गार  में मजदूरिन |
मिट्टी  घोल को भरे  -धूप की,
मार सह रही मजदूरिन ||

क्या क्या है अधिकार सुविधा  ,
अनभिज्ञ हैं मजदूकिन  |
नियम हितैषी -सरकार के ,
नहीं जानती मजदूरिन  ||

बस काम से काम उसे  है ,
श्रम  साधिका का मजदूरिन |
श्रम  की पूजा कर्म न दूजा   ,
मग्न   इसी  मैं मजदूरिन ||

मालिक मेहरबान रहे बस -
यही चाहती  मजदूरिन  |
खुशी खुशी ले मेहनताना  ,
दे मालिक, ले  मजदूरिन  ||

जितना ज्यादा करें- मिलेगा ,
यही जानती मजदूरिन |
इसी लिए जी तोड़  -काम में,
लगी रहे नित मजदूरिन |

त्योहार - दीवाली,  होली  ,
मोद मनाती मजदूरिन |
मालिक दे उपहार मे बर्तन,
खुश हो जाती मजदूरिन  ||

शोषण का मतलब  न समझे,
तनिक न सोचे मजदूरिन |
श्रम, कर्म, कर्तव्य  समझे,
काम ही  पूजा  मजदूरिन  ||

जो मिलता उसमें ही खुश हो,
करे  गुजारा  मजदूरिन |
नहीं ईर्ष्या ,उसे किसी से,
रहे मौज में मजदूरिन ||

हक से वंचित, - खर्च  सभी कुछ,
स्वयं  उठाती  मजदूरिन |
बच्चे पढ़ते - घर किराया,
स्वयं चुकाती मजदूरिन  ||

टीवी पंखे, कूलर घर मे,
रखती अपने मजदूरिन |
पति साथ -बच्चों के संग में,
हर्षा रहती मजदूरिन  ||

*रामगोपाल राही,लाखेरी
जिला- बूँदी (राज0)

 

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