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मजदूर
April 29, 2020 • शोभा रानी तिवारी • कविता

 *शोभा रानी तिवारी
 
हां मैं मजदूर हूं , हां मैं मजदूर हूं ,
समुद्र की छाती चीरकर, बांध बनाया,
अपने हाथों से, सृष्टि का निर्माण किया,
 चट्टानों को काटकर ,राह बनाई,
 रेगिस्तान को ,हरा भरा किया ,
फिर भी आत्म सम्मान, से दूर हूं।
हां मैं मजदूर हूं, हां मैं मजदूर हूं ।
अन्न उगाता हूं धरती से ,पर भूखा रह जाता हूं,
 औरों के तन ढकता वस्त्रों से ,बिना कफन मर जाता हूं,
 पेट की आग बुझाने को, मैं मजबूर हूं,
 हां मैं मजदूर हूं ,हां मैं मजदूर हूं।
 निर्धन का खून चूस चूस कर ,अपना घर ही भरते हैं ,
नागों जैसा फन फैलाए ,मजदूरों को डरते हैं,
 जिंदगी का बोझ कंधों पर उठाता हूं,
 हां मैं मजदूर हूं ,हां मैं मजदूर हूं ।
जिनका वर्तमान गिरवी, भविष्य अंधकार है,
 धरा बिछौना छत आसमां, ना कोई बहार है,
 बोल ना पाता मालिक के आगे ,अपना सर झुकाता हूं,
 हां मैं मजदूर हूं ,हां मैं मजदूर हूं।
 
 *शोभा रानी तिवारी ,इंदौर
 

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