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मजदूर
May 1, 2020 • प्रीति शर्मा 'असीम' • कविता

*प्रीति शर्मा 'असीम'
कभी इंटे उठाता।
कभी तसले ,
मिट्टी  के भर -भर ले जाता।
 
पीठ पर लादकर ,
भारी बोझे,
वह चंद सिक्कों के लिए ,
एक मजदूर ,
कितना मजबूर हो जाता।
 
ना सर्दी ,
ना गर्मी से घबराता।
मजबूरी का ,
फायदा ठेकेदार उठाता।
 
इतने पैसे ......नहीं मिलेंगे।
मन मारकर ,
जो देना है ..........!!!!!!!!
दे दो मालिक ,
कह कर चुप रह जाता।
 
मजदूर अपनी,
मेहनत का ,
आधा हिस्सा भी ना पाता।
कितना मजबूर होकर रह जाता।‌।
 
 *प्रीति शर्मा "असीम "
 नालागढ़ हिमाचल प्रदेश
 

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