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मैं थककर चूर हो गया हूँ
June 1, 2020 • रविकान्त सनाढ्य • कविता
*रविकान्त सनाढ्य
आपको मुझे श्रमजीवी कहते हुए गर्व होता होगा , 
पर वास्तविकता यह है कि मैं 
शर्मजीवी बनकर रह गया हूँ !
 
यही मेरी नियति है , 
बचपन से पचपन  तक 
पूरा खलास हो गया हूँ ।
उपवन में खिले हुए  ताज़ा गुलाब, 
मैं जंगल का पलाश हो गया हूँ ।
 
जीवन है थार का मरुथल , 
मैं अदद  बौनी- सी 
छाँह की तलाश हो गया हूँ ! 
 
जमाए बैठे हैं सभी 
अपने आसन , 
मुझे मिलता तक नहीं पूरा राशन !
 
अस्त-व्यस्त इतना कि 
कबाड़ की दुकान हो गया हूँ  ! 
 
मेरे सपनो  में भी बसता था 
एक हसीन भारत , 
मैं 'अभावों का हिन्दुस्तान ' 
हो गया हूँ ।
 
चाहत थी अपनी 
अस्मिता की तलाश , 
होकर के हताश,  
 मैं भटकाव में ही खो गया हूँ ! 
 
लिखो, बस लिखो मुझपर 
कविताएँ और महाकाव्य , 
मैं सुनने का अभ्यस्त 
हो गया हूँ ! 
 
आत्मनिर्भरता की हुमक थी 
मन में , 
कुछेक की नज़रों में 
परोपजीवी हो गया हूँ !  
 
मुझे श्रमिक कहो या मज़दूर , 
मैं अपनेआप से दूर हो गया हूँ ! 
मत दिलाओ मुझे राहत या दिलासा, 
 
 टूट गया हूँ पूरी तरह और 
थककर चूर हो गया हूँ ! 
थककर चूर हो गया हूँ !!
*भीलवाड़ा ( राज.)
 

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