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मैं प्रेम हूं 
September 11, 2020 • ✍️प्रेम बजाज  • कविता
 
✍️प्रेम बजाज 
हां मैं प्रेम हूं ,
संसार की हर सुन्दर
शय में हूं मैं , 
सुबह कि उगती 
सूरज की किरणों में हूं मैं ,
चिड़ियों की चहचहाहट
में हूं मैं ,
नदी में बहते पानी में ,
झरनों से गिरती पानी की
रवानी में ,
सागर की लहरों में ,
सांझ के ढलते पहरो में ,
रात की चांदनी में ,
प्यार से निहारते चांद को
चकोर के दिल में हूं मैं ।
महबूबा की आंखों में ,
आशिक की बातों में ,
इश्क की रातों में ,
खनखनाती चूड़ी की
खनक मे ,
महबूब की बाहों में ,
इश्क की राहों में बस मैं ही मैं ।
इश्क का आगाज़ हूं ,
इशक का अंजाम हूं ,
आशिक की पहचान हूं ,
प्यारे से दिल की
धड़कन और जान हूं मैं ।
मां की ममता में ,
बहन के स्नेह में ,
भाई की डांट में ,
पिता के लाड में बस मैं ही मैं ।
दोस्त की दोस्ती में ,
मासूम की हंसी में ,
तुतलाती तोतली जुबां में ,
बुजुर्गो के आशीर्वाद में बस मैं ही मैं ।
आप सब के दिल में ,
हर महफ़िल में ,
हर ख़ुशी में ,
प्यार भरी ज़िन्दगी में ,
किसी के दिए हुए तोहफे में ,
किसी की दुआओं में ,
प्यार से जो ले उन बलाओं में ,
जीवनसाथी के साथ में ,
संग-संग भीगते हुए बरसात में ,
रूठने - मनाने की मनुहार में ,
हर सु बस प्रेम ही प्रेम ,
बस प्रेम ही प्रेम ।
हां मैं प्रेम ही तो हूं ,
जिसके बिना ना चले संसार ,
जिसके बिना ना सुखी
घर- परिवार 
 

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