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मैं एक पिता हूंँ
June 21, 2020 • अंजनी कुमार • कविता
*अंजनी कुमार
मैं एक पिता हूँ
आज बयां करता, अपनी जज्बात हूँ
कभी लाता तुम्हारे लिए खिलौना हूँ
मेरे साथ खेलते-खेलते,
बनाता मुझे हीं खिलौना तू
कभी वृक्ष की छांव हूँ
घूप से करता बचाव हूँ
जताता नहीं कभी पर, रखता लगाव हूँ
अपनी मुस्कान में छुपा लेता अपना घांव हूँ
खुद को गिरा-गिरा कर, 
बनाता तुम्हारे राह आसान हूँ
दर्द से सीना फटा जाता है, 
पर कहता "मैं नहीं परेशान हूँ"
तुम्हारीं ख्वाहिशों की खातिर, 
दबा लेता अपने सारे अरमान हूँ
अपने फर्जो को निभाते-निभाते,
हो जाता मैं कुर्बान हूँ
मैं बयां नहीं करता कभी तुम्हें,
पर, रखता तुमसे प्यार और दुलार हूँ
तुम्हारी भलाई की खातिर,
लगाता तुम्हें कभी-कभी फटकार हूँ
जो है सबसे जरुरी इस जिन्दगी की खातिर,
मैं वहीं सांसो वाली बयार हूँ
मेरे प्यार को महसूस करना तुम,
खुद से करता नहीं इज़हार हूँ
कभी न निकलने वाले आसूंओं को
तुम भी एक दिन देखोगे,
आज मैं क्या करता हूँ न समझों शायद,
पर, खुद माता-पिता बनते हीं सब समझ जाओगे
अपने दिखावटी मुस्कान से, अपने दर्द छुपाओगे
जब मैं दादा और तुम मम्मी व पापा बन जाओगे
पहली और आखिरी एक हीं रखता अरमान हूँ!
जब आकर बेट-बेटियां कहें, 
"पापा" मैं अब आपकी पहचान हूँ!!
*टेल्को, जमशेदपुर
 

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