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महतो टोला
July 23, 2020 • ✍️शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' • गीत/गजल
✍️शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'
 
दुःख की ‘दालमोठ’ खाते हैं,
आसमान की बालकनी में,
बैठे छुटपन-तारे |
 
पानी की टंकी के नीचे,
मधुमक्खी की भनभन,
बच्चे बीन रहे हैं गत्ते,
भूख छछनती छन-छन,
‘मुनरी’ के हाथों में चिपके,
रोटी के जुगाड़ के लासे,
महल उठाते गारे |
 
जली ‘पंचलाइट’ तो कितने
लेखक ‘रेणु’ हँसे हैं,
किसे नहीं यह ज्ञात कि कितने,
‘गोधन’ अभी फँसे हैं,
घूम रहे ‘महतो टोला’ में,
लेकर ‘बिजली-बत्ती’ झंडे,
‘लालटेन’ के नारे |
 
संसद और विधानसभाएँ,
बाँट रही हैं धंधे,
कोरोना की भेंट चढ़ो ! को,
नहीं मिले हैं  कंधे,
आश्वासन की चढ़ी कड़ाही,
तले जा रहे कई साल से,
सुख के ‘शक्करपारे’ | 
 
*गंगानगर ,मेरठ
 

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