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मदारी-जमूरे की प्राचीन कथा
May 10, 2020 •  सुरेश सौरभ • व्यंग्य

 *सुरेश सौरभ
    मदारी डुगडुगी बजाते हुए बोला-चल जमूरे थाली बजा। जमूरे ने घन-घन-घन करके थाली पीटनी शुरू की। पब्लिक बटुरने लगी। मदारी ने चादर  फैलाई। 'चल जमूरे इस चादर पर परिन्दे बाबा का दिया जला।'
     जमूरा-जी हुजूर! अभी जलाता हूं।’ जमूरे ने चादर के बीचोंबीच में दिया जला दिया। 
    जमूरा लगातार थाली पीटे जा रहा था। अब मदारी डुगडुगी छोड़कर बांसुरी बजाने लगा। थाली और बांसुरी की जुगलबंदी से भाव-विभोर होकर गांव के भोले-भाले लोग उनकीं तरफ खिंचते चले आए। अब तमाम जनता गोल छल्ले की तरह उन्हें घेरने लगी। अब सिर्फ उनके चेहेरों पर मदारी का तमाशा देखने की जिज्ञासा शेष थी। 
   मदारी-जमूरे मैं जो कहूंगा, तू वो करेगा।'
   थाली बजाना रोक, जमूरे ने अपने मुंह को बड़ी तेजी से मशीन गन की तरह चलाते हुए कारतूस रूपी शब्द फेंकने शुरू किए-जी हुजूर। आप कहें, तो पानी में आग लगा दूं । आप कहें तो धरती पर स्वर्ग लोक की अप्सराओं का झमकऊंगा कैबरे डान्स करा दूं। आप कहें, तो मैं सर के बल चल के दिखला दूं, आप कहें, तो आदमी को उल्लू और उल्लू को आदमी मिन्टों-सेकेन्डों में बना दूं। आप अगर हुक्म करें, तो मेरे आका मैं पूरी दुनिया आप के कदमों में ला कर दिखा दूं।
    मदारी-चल जमूरे नागिन नाच दिखा।
    मदारी अब बीन बजाने लगा। जमूरा नागिन के वेश में बड़ी मस्ती में नचाते हुए कभी ताली बजाता है, कभी थाली बजाता है। कभी घंटी बजाता, कभी जमीन पर लोट-लोट कर बलखाता है। ऐसा लगता, उसकी नस-नस में नागिन बसी हो। उसकी मस्ती में पूरी जनता भी खूब मस्त होकर तााली बजा रही थी,  ऐसे में कुछ मनचले मौका पाकर किसी की पीठ बजा रहे थे, किसी की चांद बजा रहे थे, भीड़ अधिक थी पर तमाशा देखने के लिए ऐसी-वैसी बदतमीजियां थोड़ी बहुत होती ही रहती हैं या चलती ही रहतीं हैं, यही भीड़ का वैश्विक सच रहा है। उस गांव के निपट देहाती गंवार शायद यही सोचकर शान्ति पूर्वक तमाशे को बडे़ धैर्य और ध्यान से बस देखे जा रहे थे।
   अब जमूरा अप्सरा के वेश में खूब बनाव-सिंगार किए मस्त नाच रहा था। जनता भी खूब झूम-झूम तमाशा देख रही थी। अब बिलकुल मस्त हो चुुकी भीड़ में कुछ शोहदोें ने अपने हाथों की सफाई शुरू की।... फिर किसका हाथ किसकी जेब में जा रहा है, किसकी जेब किसके हाथ में जा रही है ,किसका मुंह किसके धड़ पर जा रहा है ,किसका धड़ किसके कंधे पर जा रहा है, किसी को होश न था, सब गड्ड-मड्ड था, सब नाच देखने की अजब मस्ती में समाएं थे। जमूरा देर तक खूब वेश बदल-बदल कर नाच दिखाते हुए सबको रिझाता रहा। नाच के बाद, मदारी परिंदे बाबा की चादर के चारों ओर गोल-गोल घूमते हुए बांसुरी बजाते हुए, चादर के समीप आकर बैठ गया। फिर बोला ऐ! जमूरे परिन्दे बाबा की आरती के लिए पैसे मांग ला। फिर, जो थाली बजा रहा था वही लेकर जमूरा जनता के पास गोल-गोल घूमते हुए जाता है, थाली रेजगारी और नोटों से भरती जाती है। जमूरा उस थाली को परिन्दे बाबा की चादर पर खाली करता जाता है। अब मदारी दूसरा तमाशा शुरू करता है। 
  मदारी- ऐ! जमूरे, 
  जमूरा-जी हुजूर! 
  मदारी-ये खाली झोला सबको दिखा आओ।’ जमूरा सबको वह बड़ा सा खाली झोला दिखा आता है। अब मदारी डुगडुगी बजाते हुए उस झोले से कभी जलेबी निकालता है, कभी कपड़े निकालता है, कभी पैसे निकलता है, कभी जेवर निकालता है, कभी गेहूं निकलता है, कभी कुछ, कभी कुछ... जनता बड़े हैरत से उसका तमाशा देख रही थी। जब तमाशा खत्म हुआ, तो मदारी बहुत करूण स्वर में बोला-मेरी माताओं और बहनों , भाइयों और मेरे अजीज बुजुर्गों। आप से बस इतनी इल्तिजा है, आप लोगों ने हमें अपना मान-सम्मान बहुत दिया है, अगर थोडा सा आटा, दाल, चावल भी लाकर दे देंगे, तो इस गरीब के पेट पर बडी मेहबानी होगी। न आदमी कुछ साथ लाता है, न अपने साथ कुछ ले जाता है। न मेरे बीवी है, न मेरे बच्चे है, बस इस पापी पेट के लिए आप लोगाें के बीच में आया हूं  और अपना तमाशा दिखा कर दुनिया-दुनिया भटक कर आप सब लोगों का दिल ही बहला रहा हूं। मेरी आप लोगाें से गुजारिश है कि आप लोग मेरा दर्द समझें। उसके सम्मोहित शब्दों में बंधे गांव के भोले-भाले लोगों ने अब उसे खूब राशन-पानी देना शुरू किया। जमूरा सब राशन-वाशन कई बोरी और झोलों में संभालने लगा। चादर पर पड़े रुपयों की भी सार-संभाल हो गई। मदारी की करूणा से डूबी आंखें देखकर एक महिला ने बहुत भावुक होकर अपनी चांदी की आगूंठी उसे दे दी । अब मदारी ने डुगडुगी बजाते हुए उस महिला का यशगान करना शुरू किया। तब कई जन्म से नाम के भूखे कुछ लोगाें ने भी उसे कुछ न कुछ कीमती सामान देना शुरू किया। मदारी जोर-जोर से डुगडुगी बजाते हुए उन सबका, यशगान करने लगा। अपने यश से फूल कर कुप्पा हो चुके लोगों ने अब उसे कंधे पर बिठा लिया और पूरे गांव में जुलूस निकाल दिया।
    बरसों बाद अगले जन्म में यही मदारी एक राज्य का प्रसिद्ध नेता बना और वह जमूरा उस नेता का चुनाव व्यवस्थापक बना।  
 
*सुरेश सौरभ,लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश 
 

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