ALL कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
मानवता अभी मरी नहीं  है
July 14, 2020 • ✍️श्याम सुन्दर श्रीवास्तव 'कोमल' • कहानी/लघुकथा

✍️श्याम सुन्दर श्रीवास्तव 'कोमल'
 
रमेश बाबू समय के बहुत पाबंद थे।उन्हें हर काम समय से करना पसंद था।लापरवाही उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थी।उन्होंने फैक्ट्री की कमान जबसे अपने हाथों में सम्हाली थी तबसे उनका कारोबार एवं साख बढ़ती ही जा रही थी।
आज सुबह से रमेश बाबू फैक्ट्री के चार चक्कर लगा चुके थे।फैक्ट्री की प्रत्येक गतिविधि पर उनकी नजर थी।उनकी नजरें घूमती हुई दुबली-पतली साँवली सी गुलबिया पर जा टिकीं।वे देख रहे थे कि गुलबिया बोझ उठाने का बार-बार प्रयास कर रही थी,किन्तु वह सफल नहीं हो पा रही थी।एक दो बार तो वह बोझ के साथ गिर भी पड़ी थी।
रमेश बाबू ने उसे वहीं से कुछ पास जाकर गौर से देखा।वह प्रेगनेंट थी।उन्होंने मुनीम जी से गुलबिया को ऑफिस में ले आने को कहा।कुछ देर बाद गुलबिया सहमी-सिमटी,हारी-थकी,पसीने से लथपथ रमेश बाबू के सामने खड़ी थी।
रमेश बाबू ने उससे कहा, " देखो गुलबिया!तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है।तुम अपना काम ठीक से नहीं कर पा रही हो।" इतना कह कर रमेश बाबू ने गुलबिया की ओर देखा,तो उन्होंने महसूस किया कि उसकी आँखें अज्ञात आशंका और भय से विस्मित हो रहीं थीं।वह काँप रही थी।उसकी आँखों में लाचारी और बेबसी स्पष्ट झलक रही थी।
रमेश बाबू ने आगे कहा, "जब तक तुम्हारी तबियत ठीक नहीं हो जाती तब तक तुम काम पर मत आना।घर पर ही आराम करो।"
लेकिन...रमेश...बाबू...हमारे बच्चों का क्या होगा...? घर गृहस्थी का खर्चा कैसे चलेगा....?? मजदूरी नहीं करूँगी तो बच्चे कैसे पालूँगी....क्या खिलाउँगी उन्हें...।" कहते-कहते उसकी आँखें भर आईं।
" मुझे एक मौका और दीजिये,मैं ठीक से अपना काम करूँगी।" कह कर वह वहीं फर्श पर बैठ गई।
रमेश बाबू ने उसे उठाया, "फैक्ट्री का प्रत्येक मजदूर हमारे लिये महत्वपूर्ण है।उसी की मेहनत,ईमानदारी और पसीने से यह फैक्ट्री चलती है।" गुलबिया बहुत ध्यान से रमेश बाबू की बातें सुन रही थी।उनकी सांत्वना भरे शब्दों में उसे आशा की एक किरण झलकती हुई दिख रही थी।
रमेश बाबू ने एक लिफाफा उसकी ओर बढ़ाते हुये कहा, "गुलबिया यह लो अपने तीन माह की मजदूरी एडवांस्ड।और हाँ तीन महीने बाद तुम अपने काम पर जरूर आ जाना।आओगी न...।" कह कर उन्होंने गुलबिया की ओर देखा।वह अपने खुशी के आँसू पोंछते हुये बोली, "जी...रमेश..बाबू.. जरूर आउँगी।"
उस बिना पढ़ी-लिखी औरत के चेहरे के हाव-भाव यदि कोई पढ़ सकता तो वह समझता, मानो वह यह प्रकट कर रहे थे कि, " मानवता अभी मरी नहीं है जिन्दा है।"
*लहार,भिण्ड,म०प्र

अपने विचार/रचना आप भी हमें मेल कर सकते है- shabdpravah.ujjain@gmail.com पर।

साहित्य, कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी लेख/रचनाएँ/समाचार अब नये वेब पोर्टल  शाश्वत सृजन पर देखेhttp://shashwatsrijan.com

यूटूयुब चैनल देखें और सब्सक्राइब करे- https://www.youtube.com/channel/UCpRyX9VM7WEY39QytlBjZiw