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मानव एवं जीव-जन्तु की सेवा- सुरक्षा हेतु दृढ़ संकल्प
May 27, 2020 • डॉ सिंकदरलाल

कहा जाता है कि यदि व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से ईश्वर की बनाई हुई संरचना- मानव एवं जीव-जन्तु  की अपनी क्षमतानुसार जीवन पर्यन्त सेवा- सुरक्षा में लगा रहता है तो ईश्वर उस मानव को जीवन पर्यन्त किसी न किसी रूप में सुख- शान्ति अवश्य प्रदान करता रहता है| वैसे तो मैं निरन्तर प्रकृति रूपी ईश्वर को साक्षी मानकर अपनी क्षमतानुसार मानव एवं जीव-जन्तु की सेवा- सुरक्षा में लगा रहता हूँ, जिसका उदाहरण, यहाँ दे पाना असम्भव ही है, फिर भी जब से लाॅक डाउन हुआ कि मुझे तो किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं हुआ, क्योंकि मैं निरन्तर मानव एवं जीव-जन्तु की भलाई हेतु अपनी क्षमतानुसार  सकारात्मक कर्म एवं चिन्तन - मनन करने की कोशिश करता रहता हूँ | लेकिन समाज में विराजमान् मानव एवं जीव-जन्तु की पीड़ा को देखकर पहले से इनके प्रति जो हमारे ह्रदय में पीड़ा थी,वह कहीं और बढ़ गई है| मैं इतना बड़ा विशाल संसार रूपी पावन धाम में विराजमान् मानव एवं जीव-जन्तु रूपी मूर्तियों की सेवा- सुरक्षा तो कर नहीं सकता, फिर भी हमारे यहाँ जो काम करती है, हमने कहा आप अपने घर में सुरक्षित रहो हम आपको पूरा पैसा देंगे और जितना हमसे बन पड़ेगा, वह भी हम सहयोग करेंगे| मुख्यमंत्री राहत कोष में दिया ही था| जो कपड़ा इत्यादि प्रेस करते हैं उनको एक हजार रुपये, जो बाल इत्यादि काटते हैं उनको एक हजार रुपये इसी तरह जिनके पास खेती- बारी बिलकुल नहीं है उन्हें भी हम अपनी क्षमतानुसार सहयोग करने की कोशिश करते रहे हैं | इसी तरह एकाद दिन के अन्तराल में जब  हम सब्जी इत्यादि लेने के लिए बाजार जायें  तो जिसकी विक्री नहीं होती थी मैं उसके यहाँ से सब्जी इत्यादि लेता था , यदि हमने बीस रुपये का सामान लिया तो इन्हें हम दश - पन्द्रह रुपये और देते थे, कुछ लोग ले लेते थे कुछ लोग नहीं भी लेते थे, तो हम कहते थे कि हमने आपका सामान छाँट कर लिया है इसलिए हम आपको दश- पन्द्रह रुपये अधिक दे रहे हैं| अनबोलता पशु कुत्ते आदि के लिए रोटी बढ़वा कर बनवा लेते थे क्योंकि इस लाॅक डाउन में कुत्ते आदि जीवों का भी पेट नहीं भर पाता है क्योंकि जब आम इंसानों के पास खाने की पर्याप्त सामग्री नहीं है तब वह कुत्ते, बिल्ली आदि जीवों की पेट कहाँ से भरेगा | इसी तरह मैं अपनी क्षमतानुसार कुछ गायों की भी पेट भरने की कोशिश करता था| 
  एक दिन मैं सब्जी लेने के लिए बाजार गया | मैं मूली खरीद रहा था | हमने कहा भइया हमको भी एक किलो मूली दे दो, हम मूली ले रहे थे कि एक दादा जी आये, उनकी उम्र पचहत्तर वर्ष की आस- पास रही होगी, लेकिन उनकी स्थिति ठीक न होने के कारण और अधिक उम्र के लग रहे थे |दादा जी मूली का भाव लिया| मूली वाला बोला हम बारह रुपए किलो देंगे| दादा जी बोले हम एक पाव लेंगे और दो रुपये देंगे, मूली वाला बोला हम एक पाव का तीन रुपये लेंगे, लेना हो तो लो नहीं तो कोई बात नहीं| मैं उन दादा जी की वास्तविक स्थिति को बताना नहीं चाहता नहीं चाहता हूँ क्योंकि जिस प्रकार कुछ लोगों द्वारा सोसलमिडिया पर, अधिकतर ईमानदार प्रवासी मजदूरों के ऊपर उपहास एवं हँसी- मजाक किया जा रहा था, कहीं मेरे द्वारा इस दादा जी की वास्तविक स्थिति बयाँ करने पर कुछ लोग उपहास, हँसी- मजाक आदि करना न शुरू कर दें, इसलिए मैं यहाँ इनकी वास्तविक स्थिति को नहीं बता रहा हूँ| हम इस बात को समझ सकते हैं कि जो व्यक्ति तीन रुपये का एक पाव मूली खरीदने में असमर्थ है , उसका वास्तविक जीवन कैसे हो सकता है अर्थात् जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण का भक्त सुदामा की दीन-दसा थी ठीक ऐसे ही इनकी थी| हमको पीड़ा हुई, तुरन्त हमने अपने पाॅकेट में हाथ डाला, सब्जी खरीदने के बाद जो पैसा था, उसी को हमने दे दिया, लगभग साढ़े तीन- चार सौ रुपये के आस -पास रहा होगा| हमने कहा दादा जी! हमारे विषय संस्कृत रूपी माँ सरस्वती ने हमको प्रसाद स्वरूप हमेशा प्रदान करती रहतीं हैं इसलिए आप भी इस पैसे को प्रसाद स्वरूप रख लीजिए और आप अपने लिए धोती इत्यादि खरीद लीजियेगा | इसी तरह इसी लाॅक डाउन के समय एक आदमी हमारे किराये के घर के पीछे प्लास्टिक का गिलास,बोतल आदि ढूंढ कर बिन रहा था, हमने देख लिया हमने कहा भइया! आप दरवाजे के सामने आयें, हमने पूछा भइया! आप कहाँ रहते हो? उन्होंने ने कहा हम पुल के नीचे रहते हैं|हमने सोचा कि इस लाॅक डाउन में तो कबाड़ भी बिकना मुश्किल है | फिर हमने दो सै रुपये प्रसाद स्वरूप दिये और हमने कहा भइया! आप इससे जरूरत का सामान ले लेना | इस तरह से हमने लगभग दश- ग्यारह हजार रुपये लाॅक डाउन में प्रसाद स्वरूप बाँट डाले होंगे| इसी प्रकार हम जीवन पर्यन्त अपने महाविद्यालय रूपी पावन धाम तथा संसार रूपी पावन धाम की अपनी क्षमतानुसार सेवा- सुरक्षा में लगे रहते हैं|
कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हम सभी लोग अपनी -अपनी क्षमतानुसार अपने- अपने क्षेत्र में, संसार रूपी पावन में विराजमान् मानव एवं जीव-जन्तु रूपी मूर्तियों की सेवा- सुरक्षा करते रहेंगे तो निश्चित ही सबका घर परिवार चलता रहेगा | हम सभी लोग जीवन पर्यन्त इस बात का संकल्प लें कि भगवान् बुद्ध का सम्यक् जीविकोपार्जन अर्थात् हमारी कोशिश हो कि हम जीवनभर ईमानदारी के रास्ते पर ही चलकर अपना घर- परिवार, रूप- सौन्दर्य आदि सजाये - सँवारेंगे  न कि बेईमानी, भ्रष्टाचारी आदि के पैसों से| इस प्रकार मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि ईमानदारी की कमाई एवं मानव एवं जीव - जन्तु की सेवा- सुरक्षा में ही आत्मा की शान्ति है न कि बेईमानी पूर्वक कमाये गये धन- दौलत, रूप- सौन्दर्य तथा भोले- भाले मानव एवं जीव-जतु का शोषण करने से| अतएव मैं स्पष्ट रूप से कह सकता हुँ कि मुझे पहले की भाँति लाॅक डाउन के समय में भी ईमानदारी पूर्वक जीवन यापन करने तथा मानव एवं जीव-जन्तु की अपनी क्षमतानुसार सेवा - सुरक्षा करने की दृढ़ इच्छाशक्ति होती रही और तदानुसार मैं जीवन निर्वाह करता रहा और करता रहूँगा|
*डॉ० सिकन्दर लाल , ढिंढुई, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) 
 

इस विशेष कॉलम पर और विचार पढ़ने के लिए देखे- लॉकडाउन से सीख 

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