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मां ममतामई मां
May 10, 2020 • डॉ. रश्मि शर्मा • कविता

*डॉ. रश्मि शर्मा

मां ममतामई मां,
जिसके आंचल में
अमृत और आंखों में आंसू
हां वही तो है ममतामई मां|
खुद भूखी रहकर भी
सबका पोषण करती मां|
है यही वह शब्द
जिसे सुनने को तरसती हर मां
मां ममतामई मां|
जब कहता है नन्हा
पहली बार मां
सर्वस्व न्योछावर करती मां|
मिलता है
आंचल कुछ समय के लिए
पर उम्र भर
बरगद सी छांव देती मां|
लगती है चोट हमें ,
पर दर्द में तड़पती है मां|
मां ममता मई मां
हमारी गलतियों पर
अपने प्यार का पर्दा डाल
अपने अनुभव से सींच
हमें सफलता की राह दिखाती मां|
हमारी खुशियों की खातिर
अपने अरमान उम्र भर दबाती मां|
हमारे सपनों को
अपनी उम्मीदों के
पंख देकर हमें आसमां की
सैर कराती मां|
मां ममतामई मां
जब कभी हम पर होती हैै
नाराज फिर दिल से रोती है
जार जार मां|
अविरल स्नेह और अनूठी
सहनशक्ति से परिपूर्ण होती है मां|
तभी तो है वह ममतामई मां
हे करुणा का सागर
और दया की प्रतिमूर्ति मां|
बिन तेरे इस दुनिया की
हर रोशनी है फीकी मां
क्योंकि जीवन रूपी इस दीये की
बाती तो तू ही है मां|
सदा रोशन किया
जीवन का पथ और
सिखाया हमें जीवन का कौशल|
तू ही तो है
ममतामई मां ममतामई मां

*डॉ. रश्मि शर्मा,उज्जैन
 

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