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क्यूं कतराते हो बेटी से (कविता)
October 9, 2019 • admin

*मीनू मांणक*

 

क्यूं कतराते हो बेटी से ।

जो जीवन का कतरा-कतरा तुम्हें समर्पित करती रही ।।

 

सुने आँगन को किलकारीयों से भरा ।

भाई की सुनी कलाई खुशियों से भरती रही ।।

 

आज झूली जिन बाहों में ।

कल उन्हीं बाबूल का सहार बनती रही।।

 

बिठा कर डोली में जब कर दिया पराया ।

भिगी पलकें लिए , मान तुम्हारा बड़ा कर जाती रही ।।

 

भेजा जिस अगंना में , वहाँ भी प्यार के फूल खिलाती रही ।

नहीं किया सवाल कभी , लाज दोनों कुल की निभाती रही ।।

 

हुई जब गर्भवती , स्पर्श कर अपनी कोख को ।

मन की आँखों से छवि संतान की संजोती रही ।।

 

कभी दर्द से करहाती ,

तो कभी ख़ुशी से पलकों को भिगोती रही ।।

 

कभी बेचैन यहाँ-वहाँ डोलती ।

तो कभी गर्भ की धड़कनों को महसूस करती रही ।।

 

कभी एकांत में वादा ये करती  ---

 

ख़ुशियों से भर दूंगीं जीवन तेरा ।

पलकों से अपनी चुन लूगीं कांटे आये ग़र राहों में बेटा ।।

 

नहीं खोया तब भी आत्मविश्वास , प्रसव पिड़ा सहती रही ।

दे कर जन्म संतान को , खुद को सोभाग्यशाली मानती रही ।।

 

लगा कर सीने से संतान को , फर्ज अपना निभाती रही ।

एक बेटी , माँ बन कर कतरा-कतरा समर्पित होती रही ।।

 

क्यूं कतराते हो उस बेटी से .....

जो जीवन का कतरा-कतरा तुम्हें समर्पित करती रही...

 

*मीनू मांणक ,2142--D , सुदामा नगर , रींग रोड़ , जारोलिया मार्केट इन्दौर (म प्र) मो. 9424588824 

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