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कुर्सी के बारे में कुछ आधी-अधूरी बातें
April 22, 2020 • धर्मेन्द्र तिजोरीवाले 'आज़ाद' • कविता


*धर्मेन्द्र तिजोरीवाले 'आज़ाद'

कुर्सियाँ यूँ तो लकड़ी की बनी होती हैं
लेकिन अब लोहे में भी उपलब्ध हैं
इन कुर्सियों पर जो भी बैठ जाता है
वो इनकी तरह ही हो जाता है
पहले कुर्सियों के पैर नहीं होते थे
तभी ये रेत और पानी में भी चल सकती थीं
लेकिन जबसे इन पर
सेवानिवृत्त नौकरशाह बैठने लगे हैं
इनके पैर ऊगते जा रहे हैं
समाज का जिस संस्था से भरोसा उठ जाता है
वो ही इसका मजबूत पैर बन जाता है
मिडिया भी अब इसका मजबूत पैर है
और न्यायपालिका प्रतीक्षा सूची में है
कुर्सियाँ चाय काफी या शर्बत नहीं पीतीं
वो सिर्फ खून पीतीं हैं
और शराब से नहाती हैं
कुर्सियों का एक पेट भी होता है भारी भरकम
जो कभी भरता नहीं है
कुर्सियाँ शाकाहारी नहीं होतीं
उनको लाशों की ज़रूरत पड़ती है
भूख में न तिलक देखा जाता है
और न ही खतना
कुर्सियाँ हमेशा जवान रहती हैं
वो शिलाजीत भी बारूद के साथ लेती हैं
कुर्सियों में दिमाग तो होता है
लेकिन दिल नहीं होता
कुर्सियाँ वक़्त को अपना गुलाम बनाना चाहती हैं
वो चाहती हैं कि सूरज भी उनके हिसाब से चले
उनकी चौखट पर दरबारी करे
और बाकी जगह अंधेरा रहे
कुर्सियाँ जब मुस्कुरातीं हैं
तो काले से काला धन भी
सूरज जितना गोरा हो जाता है
और कुर्सियों के हंसने पर
जीडीपी लुढ़क जाती है
कुर्सियाँ जब उदास होती हैं
बारूद की बू आने लगती है
बस्तियाँ जल उठतीं हैं
लेकिन इस आग में
इनका कभी कुछ नहीं बिगड़ता
ये जेड प्लस सुरक्षा में
मालिश करातीं रहतीं हैं

*धर्मेन्द्र तिजोरीवाले 'आज़ाद'
तेन्दुखेड़ा, जिला-नरसिंहपुर (म प्र)

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