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क्षितिज संस्था द्वारा संक्रामक समय में आशावादी लघुकथाओं का आयोजन
May 29, 2020 • दीपक गिरकर • समाचार

इंदौर। क्षितिज साहित्य मंच द्वारा एक ऑनलाइन ऑडियो सार्थक लघुकथा गोष्ठी का क्षितिज के व्हाट्सएप पटल पर आयोजन किया गया।  गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री सूर्यकांत नागर ने की। प्रमुख अतिथि  साहित्यकार, समीक्षक डॉ. पुरुषोत्तम दुबे रहे। गोष्ठी के आरम्भ में सस्वर सरस्वती वंदना  विनीता शर्मा  द्वारा प्रस्तुत की गई ‌।

क्षितिज संस्था के अध्यक्ष  श्री सतीश राठी द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। अतिथियों का स्वागत करते हुए श्री राठी ने कहा कि , "आठवां दशक लघुकथा के लिए एक महत्वपूर्ण समय था। उस समय में लघुकथा की स्थापना के लिए जद्दोजहद हो रही थी। बहुत सारा काम लघुकथा के लिए हो रहा था। तब  लघुकथा विधा के विकास के लिए जून 1983 में 'क्षितिज 'की स्थापना की गई। तबसे लघुकथा के लिए  संस्था  सतत कार्य कर रही है । पत्रिका क्षितिज का प्रकाशन करने के साथ लघुकथा की कई पुस्तकों का प्रकाशन एवं इंदौर में कई सारे आयोजन लघुकथा विधा को लेकर किए गए।  इन आयोजनों में सर्वश्री विष्णु प्रभाकर ,  रामनारायण उपाध्याय, मालती जोशी, यशवंत व्यास ,रामविलास शर्मा, गणेश दत्त त्रिपाठी ,विलास गुप्ते विष्णु चिंचालकर, शरद पगारे, विष्णु दत्त नागर, बलराम, बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी, अशोक भाटिया, सुभाष नीरव, भगीरथ ,योगराज प्रभाकर , नर्मदा प्रसाद उपाध्याय तथा लघुकथा के कई  महत्वपूर्ण  हस्ताक्षर क्षितिज के आयोजनों में शिरकत कर चुके हैं। लघुकथा विधा के उन्नयन के लिए समर्पित लघुकथाकारों को पिछले 2 वर्षों से क्षितिज संस्था सम्मानित भी कर रही है।

नियमित आयोजनों की श्रंखला  में ऑनलाइन लघुकथा संगोष्ठी में सर्वश्री ब्रजेश कानूनगो ने  "सभ्यता", आर.एस. माथुर ने "बोध", जितेन्द्र गुप्ता ने "थैंक्स लॉकडाउन", चंद्रा सायता ने "शोर", सुषमा व्यास "राजनिधि" ने " ममता का लॉकडाउन", चेतना भाटी ने "पानी रे पानी", अदिति सिंह भदौरिया ने "एहसास", राममूरत राही ने "पराया खून",  योगेन्द्र नाथ शुक्ल ने "भ्रमभंग",  देवेन्द्र सिंह सिसौदिया ने "अंतर सोच का", विजया त्रिवेदी ने "मजबूरी",  ललित समतानी ने "तेरह तारीख", अंतरा करवड़े ने "गंदा कुत्ता", अखिलेश शर्मा ने "विडम्बना", सतीश राठी ने "रोटी की कीमत",  ज्योतिसिंह ने "सूत सावन", नंदकिशोर बर्वे ने "आजादी", विनिता शर्मा ने "पुनरागमन", ज्योति जैन ने "अपने वाले" लघुकथाओं का पाठ किया।

इन रचनाओं पर डॉ. पुरुषोत्तम दुबे ने अपनी सटीक, सारगर्भित समीक्षा प्रस्तुत की और सभी लघुकथा प्रस्तुत करने वाले लघुकथाकारों  को बधाई दी। इस अवसर पर डॉ. दुबे ने अपनी लघुकथा "अन्न प्राशन" का पाठ किया।  आज पाठ की गई लघुकथाओं पर डॉ. पुरुषोत्तम दुबे ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा "ब्रजेश कानूनगो की लघुकथा "सभ्यता" में फिल्मी प्रभाव की स्वीकार्यता को, भारतीय सांस्कृतिक परिवेश को दरकिनार करते हुए विश्लेषित किया गया है। लघुकथा "सभ्यता" में वर्तमान पीढ़ी की लड़की के विचारों में संवाद बेड टी और गुड़ टच के विस्फोटक प्रहार से घायल हुई भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का ह्रदय विदारक चित्र खींचा गया है। आर. एस. माथुर की लघुकथा "बोध" डोर टू डोर कचरा बटोरने की गाड़ी के ड्राइवर की कर्मशीलता को रेखांकित करती है। किसी भी प्रकार के लोभ और लालच रहित उसके चरित्र का बखान करती है।

जितेन्द्र गुप्ता की लघुकथा "थैंक्स लॉकडाउन" खेत और घर के बंटवारे की नीयत से माता-पिता के पास आए दो भाईयों के परिवार के मध्य की मन-मुटाव की दरार को लॉकडाउन से उत्पन्न परिस्थिति के मरहम से भर देती है। दोनों भाई मां के ममत्व का अतिरेक पाकर बंटवारे का फैसला टाल देते हैं। डॉ. चन्द्रा सहायता की लघुकथा "शोर" में परिवार का पोता मरणासन्न वृद्ध दादा की अंतिम इच्छा पूर्ति का अनुमान लगाकर तमाम प्रतिबंधों के बावजूद उन्हें बीड़ी पीने को देता है। सुषमा व्यास "राजनिधि" की लघुकथा "ममता का लॉकडाउन" हर घन्टे चाय पीने वाले पति के अविश्वसनीय लगने वाले शौक की शल्य चिकित्सा पत्नी द्वारा लॉकडाउन में बेकार हुए झोपड़ी वाली के भूखे बच्चों के लिए करूणा ग्रसित होकर पति की चाय पर खर्च होने वाले हिस्से का दूध बच्चे के लिए दे देती है। चेतना भाटी की लघुकथा "पानी रे पानी" पानी के अपव्यय पर प्रश्न खड़ा कर पानी के संचय, उसकी आवश्यकता और उपयोगिता पर विचार रखती है।

अदिति सिंह भदौरिया की लघुकथा "एहसास" लॉकडाउन के चलते हुए मां के स्नेह का दोहन करने परिवार के पारस्परिक सामंजस्य का परिवेश बुनती है, जिससे मां को अपना घर, घर जैसा लगने लगता है। लघुकथा में चर्चित नाम है डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल की लघुकथा "भ्रमभंग" परिवार में कार्यरत नौकर रामलाल की सेविकाई का उत्कट रूप खींचती है। परिवार के बच्चे हर छोटे-बड़े काम के लिए रामलाल को ही बुलाते हैं, इस कारण परिवार के मुखिया की सोच का यह भ्रम टूट जाता है कि बच्चों को हर घड़ी उसकी जरूरत है। देवेन्द्रसिंह सिसौदिया की लघुकथा "अंतर सोच का" में पति को वेतन मिलने की प्रतिक्षा में पत्नी प्रधानमंत्री राहत कोष में दस हजार रुपए का दान करती है, लेकिन पति को सरकारी निर्देश के बावजूद आधा वेतन मिलता है, तो खर्चे की भरपाई के लिए वह अपने भाई से दस हजार रुपए मांगने को विवश हो जाती है।

डॉ. विजया त्रिवेदी की लघुकथा "मजबूरी" क्वारेंटाइन किए हुए घर में कोरोना संक्रमित पति के कमरे में उन्हें खाना देने में हर कोई घबराया हुआ है, यहां तक कि खुद की पत्नी भी। लेकिन परिवार का पालतू कुत्ता तन्हाई की ऐसी घड़ी में भी अपने मालिक के साथ उसी कमरे में रहता है। संवेदनहीनता के बरअक्स संवेदनशीलता से जड़ित लघुकथा विचारणीय है। ललित समतानी की लघुकथा "तेरह तारीख" तेरह के अशुभ अंक की मनहुसियत का बोझ उस समय खारिज कर देती है जब इस तारीख की समय पीड़ा से ग्रसित लड़की का नौकरी के लिए साक्षात्कार तेरह तारीख को ही होता है और वह इस साक्षात्कार में सफल हो जाती है। डॉ. अखिलेश शर्मा की लघुकथा "विडम्बना" जमीन में निरंतर घट रहे जलस्तर का ताना-बाना भीष्म पितामह और धनुर्धारी अर्जुन जैसे पौराणिक चरित्रों के माध्यम से बुनी जाकर जल के अभाव में मृत्यु का बोध कराती है। ज्योति जैन की लघुकथा "अपने वाले" एकेन्द्रिय जीव कैरियों से लदे आम के पेड़ की झुकी हुई विनयशीलता के बरअक्स आम का मालिक जो पंचेन्द्रियों से बना है, अपने पेड़ की कैरियों का बड़ों और बच्चों में बांटने में कृ‌पणता का ओछा भाव प्रदर्शित करता है।

सतीश राठी की लघुकथा "रोटी की कीमत" अलग प्रकार की विचारणीय लघुकथा है। इस लघुकथा का शीर्षक "रोटी की कीमत" की वाचालता ही लघुकथा का परिवेश बुनती है। जब एक सुटेड-बुटेड व्यक्ति कार द्वारा पहली बार गेहूं पिसाने आटा चक्की पर जाता है नम्बर आने पर ही चक्की वाला उसका गेहूं पिसता है, यही बात प्रकारान्तर से उसके रूतबे को छलनी कर उसे असहज बना देती है। डॉ. ज्योतिसिंह की "सूत सावन" मकान बनाने वाले कारीगर के अनुशासित परिवार पर आधारित है। जिस प्रकार कारीगर सीधी दिवार बनाने में सूत सावन का उपयोग करता है, प्रतीक रूप में घर के सदस्यों में उनके चरित्र का निर्माण सूत सावन के आदर्श व्यवहार से होता है।

सूर्यकांत नागर की लघुकथा "सांझी चिंता" अपने अपने दायित्व बोध को जमीनी अन्जाम देने में जुटे पुलिस कर्मी और गृहस्वामी के समानांतर जिम्मेदारियों का विश्लेषण करती है। प्रक‌ति के प्रति रागात्मक विचार रखने वाला गृहस्वामी पेड़ पौधों को पानी पिलाने की संवेदना के बूते लॉकडाउन की सख्ती के बावजूद पुलिस कर्मी का ह्रदय जीत लेता है। विनीता शर्मा की लघुकथा "पुनरागमन" योग और प्राणायाम के माध्यम से रोग प्रतिरोधक क्षमता को स्थायी रूप में बढाए जाने बाबत "जिम" पहुंचने वाले युवाओं को लौटने की बात करती है।

अंतरा करवड़े की लघुकथा "गंदा कुत्ता" कुत्ता और मनुष्य के बीच एक बेनाम रागात्मक रिश्ता बुन जाने की बात करती है। नित्य प्रति प्रात:कालीन सैर को निकलने वाले संभ्रान्त व्यक्ति के साथ उस व्यक्ति की अवांछा के चलते हुए भी एक सड़क छाप गंदा कुत्ता प्रतिदिन उसकी सैर का सहभागी बन जाता है और अंत में एक दिन साम्प्रदायिकता की सुलगती आग के घेरे से वही गंदा कुत्ता उसको सुरक्षित स्थान पर ले जाकर सिद्ध कर देता है कि कुत्ता गंदा या आवारा हो वफादारी निभाने में कुत्ता होकर भी कुत्ताई नहीं दिखाता। इस मंतव्य को पूर्ण बनाने में गली का कुत्ता और पालतू कुत्ता की इच्छाओं का प्रतीकात्मकता के साथ उभारा गया है।

राममूरत राही की लघुकथा "पराया खून" किसी सिनेमा के गीत की तरह सामने आती है। एक नि:संतान व्यक्ति संतान प्राप्ति के लिए पत्नी को तलाक देकर दूसरा विवाह करना चाहता है, जिसके उत्तर में उसकी मां उसे ऐसा न कर अनाथालय से किसी बच्चे को गोद लेने की बात करती है। लेकिन उसकी मां तब हतप्रभ हो जाती है कि उसका बेटा अपने खून की संतान चाहता है। उसकी मां उसके अड़ियल रवैए को दस्तक देती है कि वह खुद भी हमारे द्वारा अनाथालय से गोद लिया हुआ है। नंदकिशोर बर्वे का नाम हमारे लिए महत्वपूर्ण है। वर्ष 2018 में क्षितिज के अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन में बर्वे जी ने कई लघुकथाओं के नाट्य रूपांतरण क्षितिज के मंच पर प्रस्तुत किए थे। हाल ही में इन्होंने सतीश राठी की लघुकथा "राशन" का नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया है। इनकी लघुकथा "आजादी" में दृष्टव्य है कि गुलामी के हलवे से बेहतर आजादी की रोटी होती है।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री सूर्यकांत नागर ने कहा "अभी हमने 21 लघुकथाकारों की लघुकथाओं का पाठ सुना। सबको बधाई। सभी लघुकथाकार इस इंदौर से है, जिसे मध्य भारत में आधुनिक लघुकथा की जन्म स्थली होने का गौरव प्राप्त है। सन 1980-81 के आसपास विक्रम सोनी, सतीश दुबे, सतीश राठी और चरणसिंह अमी ने लघुकथा केंद्रित पत्रिका "लघु आघात" के माध्यम से और अन्यथा भी विधा के उन्नयन के लिए  काम किया। बाद में क्षितिज ने यह जिम्मेदारी ली और उसे पूरी जिम्मेदारी से आज तक निभा रही है । वेद हिमांशु, चंद्रशेखर दुबे, सुरेश शर्मा, चैतन्य त्रिवेदी, एन. उन्नी, अनंत श्रीमाली का भी इस विधा में निरंतर योगदान रहा है योगेंद्रनाथ शुक्ल, पुरुषोत्तम दुबे के बाद अबअंतरा करवड़े, वसुधा गाडगिल आदि  मशाल जला  क्षितिज संस्था के साथ निरंतर काम कर रहे हैं। परिपक्व लघुकथाओं का अनुभव आज सुनाई गई कई लघुकथाओं में हुआ। समय की मांग, जरूरत और लेखक की प्रतिभा ही किसी विधा की दिशा तय करते हैं। बदलते यथार्थ के रचनात्मक स्वरूप को सामने लाने का प्रयास पढ़ी हुई लघुकथाओं में नजर आता है। इधर युगीन यथार्थ की अभिव्यक्ति का जज़्बा बढ़ा है। फिर भी धैर्यपूर्वक अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। व्यंजना लघुकथा की बड़ी ताकत है जो बांची गई लघुकथाओं में दिखाई देती है। इस पूरे आयोजन के लिए इंदौरी लघुकथाकारों के साथ क्षितिज और उससे जुड़े समस्त सक्रिय साथियों का अभिवादन, बधाई और अपेक्षा कि ऐसे यज्ञों के हवन कुंड में आहुतियाँ पड़ती रहेगी।"

इस गोष्ठी की एक प्रमुख विशेषता रही है कि दो घंटे के इस कार्यक्रम में देश के वरिष्ठ साहित्यकार और लघुकथाकार श्रोताओं के रूप में उपस्थित रहकर इस ऑनलाईन लघुकथा संगोष्ठी के सहभागी और साक्षी बने। इस ऑनलाइन कार्यक्रम में  बलराम अग्रवाल, अशोक कंधवे (दिल्ली),  श्री बी. एल. आच्छा (चैन्नई)  अशोक भाटिया (चंडीगढ़), कुमार गौरव (पटना), सेवा सदन प्रसाद (मुम्बई), मुन्नुलाल (बलरामपुर, उ.प्र.), अनघा जोगलेकर (गुरुग्राम), पवित्रा अग्रवाल, सरिता  सुराणा (हैदराबाद), योगराज प्रभाकर, जगदीश कुलारिया, सीमा भाटिया (पंजाब),  पवन जैन (जबलपुर), संध्या तिवारी (पीलीभीत), ज्योत्स्ना सिंह कपिल (बरेली), अशोक मिश्र (गोरखपुर), प्रतापराव कदम, आत्माराम शर्मा, कांता राय, मधुलिका सक्सेना, संतोष श्रीवास्तव अशोक गुजराती (भोपाल), राजेंद्र काटदारे (मुम्बई),  देवेन्द्र सोनी (इटारसी), गोविन्द गुंजन (खंडवा), विजय जोशी (महेश्वर), हनुमान प्रसाद मिश्र (अयोध्या), कुलदीप दासोत (जयपुर), बालकृष्ण नीमा (नीमच), संतोष सुपेकर, डी.के. जैन, वंदना गुप्ता (उज्जैन) से शामिल हुए। सर्वश्री जी डी अग्रवाल, वसुधा गाडगिल, कविता वर्मा, शोभा जैन, सत्यनारायण व्यास (सूत्रधार), कांतिलाल ठाकरे, राकेश शर्मा , अश्विनी कुमार दुबे, वंदना पुणताम्बेकर, उमेश नीमा, पदमा राजेंद्र, रजनी रमण शर्मा, राजनारायण बोहरे, प्रदीपकांत, मनोज सेवलकर, दीपा व्यास, अनिल त्रिवेदी,  रविंद्र व्यास,  रूख़साना जी इंदौर से इस आयोजन के साक्षी रहे।

क्षितिज संस्था ने इस अनूठे साहित्यिक समारोह द्वारा लघुकथा विधा में नये आयाम स्थापित किए। इस गोष्ठी का संचालन सीमा व्यास ने किया। आभार श्री दीपक गिरकर सचिव क्षितिज संस्था के द्वारा माना गया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में ऑनलाइन उपस्थित श्रोताओं ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं पोस्ट की ।

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