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कोरोना, वापस कब जाओगी ?
March 21, 2020 • मीरा सिंह "मीरा" • व्यंग्य

*मीरा सिंह "मीरा"

अरी ओ कोरोना, सुनो न। यूं जुल्फें बिखराकर, बड़बड़ाती हुई कहां दौड़ती जा रही हो ?तनिक यह तो बताओ काहे तुम इतना गुस्साई हो ?दम तो ले लो जरा। क्या दुनिया को निगल कर ही सांस लोगी? दुनिया में दुख दर्द पहले क्या कम थे,जो तुम आ गई।कितने दिनों से अविराम हहकारती,फुंफकारती, दौड़ती जा रही हो।ना किसी की कुछ सुन रही हो, ना कुछ समझ रही हो। जब मन करता है, जहां मन करता है,तुम दनदनाते हुए ,सबको रौंदते कुचलते चल पड़ती हो। कयामत बरसा रही हो।यह तो बताओ आखिर साबित क्या करना चाहती हो ?दुनिया के बड़े-बड़े देश तुम्हारे सामने घुटने टेक चुके हैं ।अब तो मान जाओ।  
निसंदेह, तुम साम्यवादी विचारधारा की ऊपज हो।जाति, भाषा ,धर्म के बंधनों से मुक्त हो। आज की तारीख में कोई कितना भी खुद को शक्तिशाली समझता हो ,तुम्हारे सामने घुटने टेकने पर मजबूर है।मन ही मन याचना कर रहा है। कुछ तो दया करो मुझपर ।यह बात और है कि तुम्हारी कानों पर जूं नहीं रेंग रही है।
तुम्हारी नजरों में ना कोई अमीर है ना कोई गरीब ,ना कोई आम है, ना कोई खास है। सबके साथ एक जैसा बर्ताव कर रही हो। तुम से संपर्क साधने और तुम्हारी खोज खबर बताने वाला कोई बिचौलिया मेरा तात्पर्य है कि कोई मध्यस्थ कहीं नहीं दिख रहा है ।काश, तुम्हारी सेना में भी कोई जयचंद होता या कोई विभीषण  ही होता। हम यकीनन तुम्हारी कमजोर नस पकड़ लेते। तुमसे कैसे निपटना है? जान जाते ।पर क्या करें?हम विवश हैं। तुम्हारी सेना कब क्या करेगी?किधर कूच करेगी?  कोई नहीं जानता।सच,आज तुमसे दो-दो हाथ करने वाला इस धरती पर कोई नजर नहीं आ रहा है। विश्वविजय का जो ख्वाब कभी सिकंदर ने देखा था, तुम पूरा करने की जा रही हो।कही तुममें सिकंदर की आत्मा तो नहीं? तुम्हारी हरकतों से तो यही लगता है कि तुम हम इंसानों की श्रेष्ठता के अहंकार को चकनाचूर करने पर अमादा हो।हे अहंकारमर्दिनी, शांत हो जाओ।मानव जाति पर तरस खाओ।अखिल विश्व खौफ के वाणों से मर्माहत है। आलम ऐसा है कि लोग घर के दरवाजे खिड़की बंद करके कमरे में सपरिवार कैद होने   के लिए मजबूर हैं।आजतक धरती पर जितने भी युद्ध हुए,उन सबसे अलग है यह इंसान बनाम वायरस युद्ध।न समझौता न विराम, सतत, अविराम जारी है यह युद्ध । अगल-बगल किसी को खांसते देखते ही लोग दहशत में आ जा रहे हैं। मानव को इंसान नहीं,इंसान के रूप में अपनी मौत समझने लगे हैं। आस पड़ोस से भी संबंध विच्छेद हो गया है। समाज में रहने वाला आदमी अलग-थलग पड़ गया है। तीसरा विश्व युद्ध इस तरह से करना पड़ेगा,कहां किसी ने सोचा था।
जो अपने कमरे में नजरबंद हैं ,वह यह भी जानते हैं कि तुम उनके बंद खिड़की दरवाजे के बावजूद उनके घरों में धावा बोल सकती हो ।जिस छोटी कद काठी के कारण तुम कभी हीन भावना से ग्रसित हुई होगी, आज वही सूक्ष्म आकार तुम्हारे लिए वरदान सिद्ध हो रहा है ।काश, काश कि तुम बड़ी होती ।खुली आंखों से देखी जा सकती , सच मानो हम इंसान कब के तुम्हें जमींदोज कर चुके होते।दुनिया की सारी मिसाइलें तुम्हें निशाना ले रही होती ।तुम्हारी दहाड़ ने हम इंसानों को सोचने पर मजबूर किया है कि कुदरत के कहर से बचने में हम आज भी पूर्ण रूप से सक्षम नहीं हैं।एक बात बताओ कहीं कुदरत से छेड़छाड़ का यह परिणाम तो  नहीं?दरअसल खुद को सर्वश्रेष्ठ  साबित करने में हम इतने मशगूल हो गए कि कुदरत की शक्तियों को नजरअंदाज कर बैठे।अपने स्वार्थ की क्षुधा मिटाने के लिए आंख बंद करके दौड़ते भागते रहे।न कुदरत के संकेतों को समझे,न कभी अपने दिल की आवाज सुने।हम खुद से भी मिलने की फुर्सत नहीं निकाल पाए। अपने सपनों को हकीकत में बदलने के प्रयास में इतने व्यस्त रहे कि अपनों को ,अपने रिश्ते -नाते को ही भूल गए ।हमारे अपने सपने हो गए और सपने हमारे अपने हो गए। तुम्हारे कारण ही सही, आज हम खुद से और अपनों से मिल बैठ कर बात तो कर रहे हैं ।रिश्तो के अपनापन और स्नेह की शीतलता को महसूस कर रहे हैं।तुमने हमें घर में रहना सिखा दिया है। तुम्हारी बदौलत आज हम घर बैठे भी कई कामों को सहजतापूर्वक संपादित कर रहे हैं। तुमने हमें रिश्तो की गर्माहट को फिर से महसूस करने का अवसर दिया है।हमें याद दिलाया है कि हम अपने कुछ अच्छी आदतें भूल रहे थे।निरीह पशुओं पक्षियों को आश्रय देने वाले उदार रवैया हम भुला चुके थे। गौरैया हमारे घर आंगन की शोभा हुआ करती थी। अब नए घर का निर्माण ऐसे डिजाइन से करवाते हैं कि कोई चिड़िया हमारे इर्द-गिर्द नहीं आ सकती ।सच कहूं तो अब ज्यादातर घरों में आंगन ही नहीं होता है।हम बेदर्दी से पशु पक्षियों के शिकार करने लगे। ऐसा कोई दिन नहीं जब बड़ी तादाद में पशु हलाल नहीं किए गए।उन बेजुबानों की आंसू धरती माता को कितना व्यथित किए होगे, समझ सकती हूं।बेचारी अपना दुख किसे बताती? उसकी पीड़ा महसूसने की फुर्सत हम इंसानों के पास कहां रही? शायद धरती मां का कलेजा फट रहा था?मुझे लगता है इस दौर की वायरस जनित बीमारियां कुदरत की कड़ी चेतावनी है कि हम सुधर जाए। कुदरत स्वयं को संतुलित करने में सदैव सक्षम है।वह जानती है कि पर्यावरण को कैसे संतुलित करना है?वक्त रहते अगर हम नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में और भयंकर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
तुम्हारे कारण यह पहली होली है, जब मुर्गे एवं खसी  (बकरी) सपरिवार होली खेले हैं। वरना आज के दिन तो सामूहिक रूप से मुर्गों व बकरियों की कुर्बानी चढ़ाई जाती थी।दोनो बिरादरियों  के गर्दन पर तलवार लटकी हुई रहती हैं ।पशु पक्षी अवश्य तुम्हारा आभार व्यक्त किए होंगे ।
मैंने पढा और सुना है कि तुम परजीवी हो। शरीर के बाहर कितना निष्प्रभावी रहती हो लेकिन जब किसी के शरीर के अंदर प्रवेश कर जाती हो तो सहस्रों गुणा ताकतवर हो जाती हो। बुरा मत मानना।बहुत निर्लज्ज हो।अरे जिस थाली में खाती हो ,उसी में छेद करती हो। जिस डाल पर बैठी हो, उसे ही उजाड़ने का संकल्प लेती हो। समझ नहीं पा रही हूं तुम्हें एहसान फरामोश कहूं या महामूर्ख? वैसे एक बात बताओ, क्या तुम कोई भाषा समझ सकती हो? यह बताओ कैसे संवाद करती हो? अपनी सेना को कैसे आदेश देती हो? क्या कभी अपना इंटरव्यू दोगी? कितने लोगों को निगल  चुकी हो फिर भी तुम्हारी भूख नहीं मिटी है।हे असुरनंदिनी , सबके दिलों पर दहशत बन कर मंडरा रही हो।गब्बर सिंह से जो कभी नहीं डरे थे, वह तुम्हारे नाम से थरथर कांपते नजर आ रहे हैं। मानवता कराह रही है। यह बताओ यहां से कब कूच  करोगी? कितने दिनों का वीजा लेकर आई हो?सच सुनो,वो क्या कहते है न कि हमारे यहां का रिवाज है। हित पाहुन दूसरे के घर में ज्यादा दिनों तक डेरा डालकर नहीं रहते।तुम भी अपना बोरिया-बिस्तर बांधो ।लोग बाग मन ही मन यही सवाल कर रहे हैं" कोरोना, कब जाओगी? कोरोना, कब जाओगी?जनता कर्फ्यू का अर्थ समझो और भगवान के लिए इस धरती से जल्दी प्रस्थान करो। हमेशा हमेशा के लिए। ।

*मीरा सिंह "मीरा"
 बक्सर (बिहार)
 

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