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खुदा बचाये समझदारों से
April 18, 2020 • उमा पाटनी 'अवनि' • कविता

*उमा पाटनी 'अवनि'

चंचल मन के फव्वारों से

उम्मीदों के  बाजारों से

तितलियाँ फुदकती हैं कुछ यूँ
विचारों की  झनकारों  से
 
बन-बन डोलूं  क्या सोच रही
मैं जाने क्या-क्या खोज रही
कविताओं की नाव चलाती हूँ
भावनाओं की पतवारों से
 
भीग रही हूँ जो पल-पल
शब्दों की नदियों में होकर
अब राह तकूं  किसको देखूँ
मिलती हूँ रोज बहारों से
 
भंवरों की गुन-गुन में थिरकूं
कोयल संग मैं भी बोल पड़ू
नज्म लिखूँ गाऊँ मैं गीत
नटखट बारिश की फुहारों  से
 
अल्हड़ पागल सी दीवानी
सुध-बुध से भी मैं अंजानी
ओ अवनि तू नादान सही
खुदा बचाये समझदारों से
 
*उमा पाटनी 'अवनि'
उत्तराखण्ड,पिथौरागढ़
 

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