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कर्म फल
June 4, 2020 • विनय मोहन 'खारवन' • कहानी/लघुकथा
*विनय मोहन 'खारवन'
क्लर्क महोदय ने मोटरसाइकिल खड़ी की। टिफिन उठाया। ऑफिस के अंदर पहुंचा ।कुर्सी पर कपड़ा मारा। कोने में रखी कृष्ण जी की फोटो के आगे अगरबत्ती जलाई व  आवाज लगाई ,"सत्ते ओ सत्ते , कहां मर गया रे।"
सत्ता चपरासी बीड़ी मुंह में दबाए आया व बोला," राम राम साहब।"क्लर्क प्यार से बोला," क्या राम-राम यार ।इतनी दूर से आए हैं। एक कप चाय तो पिला दे यार।"
सत्ता चुपचाप चला गया।कलर्क आराम से कुर्सी पर बैठ गया। इतने में वर्मा जी आ गए। अखबारों की खबरों पर चर्चा शुरू हो गई ।सरकार ने डीए की किस्त जारी कर दी थी ।पर क्लर्क महोदय किस्त से खुश नहीं थे। चाय आ गई ।बाहर धूप सेकने लगे ।गेट से बाहर पान की दुकान पर सिगरेट पीने चले गए ।लंच टाइम हो गया था। लंच बॉक्स खुल गए ।पिकनिक वाला माहौल था। ठहाके गूंज रहे थे। खाने के बाद चाय आ गई ।एक फाइल उठाई भी ,पर डी ए  की कम किस्त ने मूड ऑफ कर दिया ।फाइल वापस अपनी जगह आ गई ।छुट्टी का टाइम हो गया। टिफिन उठाया। बाहर आ गए।
कृष्ण जी 'कर्म करो ,फल की इच्छा मत कर ',कह रहे थे पर क्लर्क महोदय ,'फल की इच्छा कर ,कर्म की नहीं ,'कर रहे थे।
*जगाधरी,हरियाणा
 

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