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कर्ज
May 10, 2020 • धर्मेन्द्र बंम • कविता

*धर्मेन्द्र बंम

सैनिक  -

मन को मोड़ा  तन को जोड़ा
सुरक्षा में अपने घर को छोड़ा
निभाया है उसने अपना फर्ज
चुकाना है  हमको वो ही कर्ज

डाॅक्टर -

ऊॅच नीच को भी पस्त किया 
जो आया उसे  स्वस्थ  किया 
दूर किया  है उसने  हर मर्ज
चुकाना है हमको वो ही कर्ज

सफाई कर्मी  -

चारों ओर  छाया है अंधकार 
नजरबंद है आज हर परिवार 
रखें स्वच्छ नगर भूलकर दर्द 
चुकाना है हमको वो ही कर्ज

मंगल भावना -

विपदा   हो  अब  दूर  हमारी
खुशबू  से महके  हर  क्यारी
आराध्य से हम करते हैं अर्ज 
चुकाना है  हमको  सारे कर्ज 

*धर्मेन्द्र बंम नागदा जंक्शन

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