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करियर
August 5, 2020 • ✍️कारुलाल जमडा़ • कहानी/लघुकथा
✍️कारुलाल जमडा़
 "मैं संतोषी बनना चाहती हूँ"|सरकारी विद्यालय की छात्रा संतोष का यह जवाब सुनकर एक बार तो टीवी चैनल का वह पत्रकार स्तम्भित सा रह गया |वह मेरिट सूची में आई जिले की चार लड़कियों का वर्जन ले रहा था कि वे क्या बनना चाहती है|किसी ने बताया कि वह कलेक्टर बनना चाहती है तो किसी ने बताया  डाक्टर ,तो किसी ने बिजनेस टाईकुन| पर जब संतोष से वही प्रश्न किया तो उसका उत्तर सचमुच चौंकाने वाला था|फिर उसे लगा कि शायद यह बालिका अपने नाम को सार्थक करना चाहती होगी|अतःपूछने लगा-"क्या तुम अपने नाम के अनुरूप अपना व्यक्तित्व बनाना चाहती हो?संतोष बोली-" जी, बिल्कुल नाम के अनुरूप ही व्यक्तित्व और करियर भी"| पत्रकार ने पूछा-"वह कैसे"?
संतोष ने जवाब देते हुए कहा कि उसकी माँ ने जगह-जगह बर्तन मांजकर और घर का काम कर उसे पढा़या है |उसकी माँ जब घरों में काम करने जाती थी,तो वहाँ से लौटकर अपने अनुभव साझा करती|सामान्यत: पढ़ रहे बच्चों को इन चीजों से दूर रखा जाता है| पर वह ऐसा इसलिए नहीं करती थी ताकि भविष्य में अपने जीवन का निर्माण करते समय मुझे किसे प्राथमिकता देना है,यह समझ सकूँ|
मेरी माँ इन परिवारों में ना केवल काम कर रही थी अपितु जीवन के सबक भी सीख रही थी |इन्हीं शिक्षाओं को उसने मेरे साथ भी बांटा और मुझे कहा था कि बेटा आगे जाकर कुछ भी बनना,पर पहले एक संतोषी और शांतिप्रिय
इंसान बनना|खुशी मन से,आत्मा की शांति से मिलती है,केवल रौबदार बडे़ पद या पैसो से नहीं |लोगों के नज़रिए से नहीं अपनी खुशी की नज़र से हर चीज़ देखना|
वह हमेशा कहती रही कि ज़रुरी नहीं कि मैं कलेक्टर ,डॉक्टर, प्रबंधक या व्यापारी ही बनूं| वह कहती है-"तुम्हे जो भी बनना है,बनों| बस यह ध्यान रखना है कि अपने परिवार के साथ खुशहाल,शांतिपूर्ण और संतोषी जीवन  बीता सको| रौबदार पद और पैसे के पीछे ही मत भागना क्योंकि वहाँ पर शांति नहीं है,सुकून और संतोष नहीं है|इसीलिए अब कुछ बनने के पहले मुझे "संतोषी" बनना है|संतोष की इतनी गहरी बात और कड़वे सच को प्रकट करता वक्तव्य सुनकर पत्रकार आगे कुछ बोल नहीं पाया|उसे वास्तविक करियर का जवाब मिल चुका था|
*जावरा,जिला रतलाम
 

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