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कलम के सिपाहीःमुंशी प्रेमचंद
July 30, 2020 • ✍️डॉ.येशुक्रिती हजारे • लेख
✍️डॉ.येशुक्रिती हजारे
मुंशी प्रेमचंद  साहित्य के वह सूर्य हैं जो अपनी लेखनी के माध्यम से समस्त नवोदित साहित्यकारों का  सही मार्गदर्शन करते हुए नजर आते हैं | साहित्य जगत में सबसे लोकप्रिय लेखकों में से वे एक जो  कलम के सिपाही के नाम से सुविख्यात है जिन पर निरंतर वर्तमान में भी शोध कार्य हो रहे हैं |
प्रेमचंद जी का जन्म 31जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गांव में हुआ | माता - पिता ने उनका  नाम धनपतराय रखा  इन्हें  चाचा प्यार से नवाबराय कहकर पुकारते थे |  माता का नाम आनंदा देवी तथा  पिता का नाम मुंशी अजायबराय श्रीवास्तव था। उन्होंने लमही डाकखाने  में क्लर्क की नौकरी की जिससे उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय थी |
जीवन  धनपतराय श्रीवास्तव जब वे आठ वर्ष के थे तब उनकी माता आनंदादेवी की मृत्यु हो गयी उसके पश्चात उनके पिता ने दूसरा विवाह भी कर लिया किंतु वे मां के प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी कभी पा ना सके सौतेली मां  के कुटिल व्यवहार के कारण  परेशान रहते थे |  घर में भयंकर गरीबी  होने के कारण इन्हें नहीं ठीक से भोजन मिलता और ना  पहनने के लिए ढंग से कपड़े | 
प्रेमचंद पांच वर्ष के थे तब से उन्होंने पढ़ाई शुरू कर दी थी  उनकी प्रारंभिक अध्यापन की झलक ' होली की छुट्टी' कहानी में मिलती है | धनपतराय अपनी पढ़ाई गरीबी से लड़ते हुए मैट्रिक तक पूरी की | शिक्षा के लिए वे सुबह से पैदल शहर पढ़ने जाते थे शाम को  घर लौटते थे | स्कूल आने जाने के झंझट से बचने के लिए उन्होंने एक वकील साहब के घर  ट्यूशन पढ़ाने लग गए उससे उन्हें पांच रुपये मिलते थे | उस पांच रूपए में  से तीन रुपये घर वालों को तथा दो रुपए अपनी जिंदगी की गाड़ी को चला लेते थे | 
उनके पिता ने धनपत राय का विवाह पन्द्रह वर्ष की आयु में ही उनसे बड़ी उम्र की लड़की से तय कर दिया था | वह लड़की  न सुस्वभावी  थी और नहीं सुंदर | उसी दौरान उनके पिता अजायबराय श्रीवास्तव का स्वर्गवास हो गया | पत्नी भी पारिवारिक कटुताओं  के चलते उन्हें छोड़ कर चली गई उनके कोमल मन का  कल्पना भवन  नये जीवन की नींव रखते ही सूनसान हो गया| इसके बावजूद वे पहली पत्नी को खर्चा  भेजते रहें | 
मुंशी प्रेमचंद  विधवा विवाह के बहुत पक्षधर व हितैषी थे | सन 1905 के अंतिम दिनों में उन्होंने बाल विधवा कर शिवरानी देवी से विवाह कर लिया  दूसरा विवाह करने के पश्चात उनके जीवन में परिवर्तन दिखाई देने लगा |  आर्थिक तंगी में सुधार होने लगा था तथा उनके लेखन कार्य में अधिक सजगता आ गई थी | बहुत जल्द ही  उन्हें  स्कूलों में  डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त कर दिया गया था  इस वक्त उनके जीवन में खुशहाली का माहौल था | जिसका असर उनकी पांच कहानियों का संग्रह 'सोजे वतन' के रूप में सृजित होते दिखाई दिया |
धनपतराय उर्फ मुंशी प्रेमचंद जी का जीवन लोगों के लिए किसी प्रेरणा से कम ना था सरलता व उदारता  के वह एक प्रतिमूर्ति थे | वे जीवन में अनेक विकट परिस्थितियों से घिरे होने के बावजूद भी वे सदा हंसमुख व उदार स्वभाव के थे |  एक ओर उनके हृदय  में अपने इष्ट मित्रों के लिए सम्मान के साथ आदर भाव भी रखते थे तो दूसरी ओर गरीबों तथा पीड़ितों के लिए अधिक  सहानुभूति भी रखते थे  | कहा जाता है कि मुंशी प्रेमचंद जी को उनकी पत्नी ने ठंड के दिनों में 40- 40 रुपए दो बार दिए लेकिन उन्होंने वह रुपए भी प्रेस मजदूरों को दे दिए | पत्नी के नाराज होने पर उन्होंने कह दिया कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हो और हम गर्म सूट पहने   |    
बचपन से ही उन्हें पढ़ने का शौक था तेरह  वर्ष की आयु में ही उन्होंने 'तिलिस्मे होशरूबा' तथा उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ सरशार, मिर्जा रूसबा और मौलाना सार के उपन्यासों से परिचय लिया था |  मोटी - मोटी जिल्दों वाली किताब तीन-चार दिन में ही पढ़ कर खत्म कर देते थे, किताब पढ़ने में रुचि होने के कारण एक बार तंबाकू वाले से दोस्ती कर उसकी दुकान पर मौजूद तिलिस्मे होशरूबा पढ डाली | प्रारंभ में उन्होंने कुछ नाटक लिखे बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना शुरू किया | इस तरह साहित्यिक लेखन का सफर शुरू हुआ जो मृत्यु के अंत तक उन्होंने अपनी कलम चलाई |
प्रेमचंद का अपना पूरा जीवन लेखन के प्रति समर्पित था इन्होंने लगभग 300 से अधिक कहानियां लिखी |  उनकी प्रथम कहानी संग्रह 'सोजे वतन' नाम से जून 1960 में प्रकाशित हुआ उनकी कहानियों में प्रायः किसानों, मजदूरों, दलितों तथा स्त्रियों आदि की समस्याओं का वर्णन, देश प्रेम ,स्वाधीनता संग्राम, तथा पशु -पक्षी का वर्णन भी उनकी कहानियों में मिलता है | प्रेमचंद ने दलित मनोविज्ञान के दो पक्षों को उकेरा है पहला पक्ष  दलितों पर  हो रहे शोषण को अपनी नियति समझता है तथा वही दूसरी ओर दलितो में उभरता हुआ एक ऐसा पक्ष है जो इस शोषण का विरोध करने को भी  तैयार  है |
 नमक का दरोगा, सद्गति, दो बैलों की कथा, पूस की रात ,पंच परमेश्व,र माता का हृदय, घमंड का पुतला, बड़े घर की बेटी , मां, वरदान, कफन आदि | प्रेमचंद ने कर्बला, संग्राम, प्रेम की बेटी आदि नाटकों का लेखन किया है किंतु उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिल पाई |
प्रेमचंद एक संवेदनशील कथाकार होने के साथ एक सजग नागरिक व संपादक के रूप में सामने आते हैं | उन्होंने हंस ,जागरण ,माधुरी ,चांद , मर्यादा , स्वदेश आदि पत्र -पत्रिका  में सामाजिक चिंताओं को साहित्यिक लेखों तथा  निबंधों द्वारा संपादित किया है |
गांधी के जीवन दर्शन, कार्य प्रणाली तथा व्यक्तित्व के प्रति प्रेमचंद की गहरी श्रद्धा  रही है | ह्रदय परिवर्तन द्वारा राम राज्य स्थापना करना इनका ध्येय रहा  | देश के लगभग पचहत्तर  फ़ीसदी आबादी वाले किसानों की वास्तविकता को समझने वाले पहले रचनाकार साबित होते दिखाई देते हैं किसान आंदोलन से  जुड़ा 'प्रेमाश्रम' जिसमें किसान जमीदार के खिलाफ तन कर खड़े मिलते हैं तो वहीं  दूसरी ओर रंगभूमि का सूरदास छोटी सी जमीन का मालिक होते होते हुए भी पूंजीपति से सीधा संघर्ष करता नजर आता है | 'कर्मभूमि ' में किसान के अतिरिक्त छात्र ,मजदूर ,हिंदू मुसलमान, गरीब-  अमीर समस्त लोग को शामिल करते हुए दिखाई देते हैं | 'गोदान' में आते-आते भारतीय किसान की दयनीय व वास्तविक स्थिति का वर्णन करते हैं  गोदान उपन्यास में किसान जीवन का करुण , त्रासदीपूर्ण ,मर्मस्पर्शी दस्तावेज बन जाता है | सेवासदन, रंगभूमि, प्रेमाश्रम ,कर्मभूमि, निर्मला , गबन, गोदान ,मंगलसूत्र आदि लिखे गये |
प्रेमचंद ने अपने समय के भारतीय समाज का गहन व व्यापक अध्ययन किया है उनके लिखित साहित्य में बाल विवाह दहेज प्रथा, बेमेल विवाह, वेश्यावृति जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरोध में अपनी लेखनी चलाई तो वहीं दूसरी ओर महिलाओं की शिक्षा एवं विधवा विवाह के पक्ष में भी लिखा  |
साम्राज्यवाद ,जातिवाद, सामंतवाद  तथा सांप्रदायिकता को इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन समझते थे इनके खिलाफ ताउम्र लिखने वाले मुंशी प्रेमचंद एक सच्चे समाज सुधारक थे |  हम कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी लिखित रचनाओं के माध्यम से समाज को सुधारने का प्रयास किया मुंशी प्रेमचंदजी की रचना -दृष्टि, विभिन्न प्रकार के साहित्य में अभिव्यक्त होते दिखाई देती है | वे एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे साहित्य का शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र अछूता रहा जिस पर उन्होंने अपनी लेखनी नहीं चलाई हो | उपन्यासकार सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद की मृत्यु 8 अक्टूबर 1930 को वाराणसी में मृत्यु हुई | 
*डोंगरगढ़, जिला राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) 
 

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