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कहानियों और लघु कथाओं का उत्कृष्ट संकलन है 'इन्नर'
May 20, 2020 • सरिता सुराणा • समीक्षा/पुस्तक चर्चा

सर्वप्रथम मैं इस पुस्तक के प्रकाशन हेतु आदरणीय संपादक विभूति भूषण झा जी को हार्दिक बधाई एवं साधुवाद देती हूं, जिन्होंने अपनी माताजी की प्रेरणा से इस परिश्रमशील कार्य को अपने हाथ में लेकर उसे अंजाम तक पहुंचाया। निस्वार्थ भाव से की गई उनकी यह साहित्य सेवा निश्चय ही प्रशंसनीय है। 'इन्नर' सभी साहित्यिक विधाओं की रचनाओं का साझा संकलन है। इसमें कहानी, लघुकथा, कविता, गीत और ग़ज़ल सभी को संकलित किया गया है। गद्य भाग में कहानियां और लघुकथाएं संकलित हैं, यहां पर उनके विषय में ही मैं अपने विचार रख रही हूं।
 
इस संकलन की प्रथम कहानी है- 'महादान'। इसमें लेखिका सिनीवाली शर्मा ने कन्यादान को महादान करार देते हुए इस पर कई प्रश्न उठाए हैं। साथ ही जुए की लत के शिकार मनुष्य के घर की दुर्गति का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है। जुए में हारे जुआरी द्वारा पैसों के बदले दूसरे जुआरी को अपनी जवान बेटी से ब्याह कर उसकी जिंदगी बर्बाद करने में उसे तनिक भी आत्म ग्लानि नहीं हुई। एक खराब आदत जब लत बन जाती है तो उस इंसान का घर-बार सब कुछ उजड़ जाता है। डॉ. मंजरी शुक्ला की कहानी 'प्रतिशोध' ये समझाने में असफल रही है कि प्रोफेसर साहब को गुप्ता अंकल से इतनी चिढ़ क्यों थी? दूसरा सवाल ये कि उनके बेटे मोहित का ऑपरेशन जब दिल्ली में हुआ तो उनके पड़ौसी गुप्ता अंकल की पत्नी का हार्ट वहां ट्रांसप्लांट कैसे किया गया? प्रोफेसर साहब सिर्फ गुप्ता अंकल के अपने घर आना बंद करने के लिए इतना नीचे गिर गए कि वे साधारण शिष्टाचार भी भूल गए। एक वृद्ध आदमी के घर की बिजली बंद कर देना, उसके बगीचे में गाय को छोड़ देना, उनका अखबार चुरा लेना जैसी शर्मनाक हरकतें तो कोई मानसिक विक्षिप्त ही कर सकता है। फिर ये सच्चाई पता चलने पर कि उनके बेटे मोहित के सीने में गुप्ता जी की पत्नी का ही दिल धड़क रहा है, वह नीच आदमी उनसे माफ़ी मांगता है लेकिन उसके चरित्र को देखते हुए ऐसा लगता नहीं कि वह सचमुच माफी मांगना चाहता है। ये कहानी आदमी के स्वार्थ की पराकाष्ठा और बदले की भावना को दर्शाती है। 
 
' स्पीचथैरेपी' नौकरीपेशा लोगों की उस सच्चाई को बयां करती है, जिनके लिए अपने नवजात शिशु के पालन-पोषण से ज्यादा जरूरी है नौकरी करना। एक मां अपना समय अपने बच्चे को नहीं देती लेकिन उसके न बोलने पर स्पीचथैरेपी के लिए अपनी कमाई के पूरे पैसे उसमें खर्च कर देती है। ये कहां की बुद्धिमत्ता है, पहले तो आपके पास बच्चे से संवाद करने के लिए समय नहीं है और बाद में उसके न बोलने पर डाॅक्टरों के चक्कर लगाने के लिए आपके पास समय है। टूटते संयुक्त परिवार और बुजुर्गो की उपेक्षा का सीधा असर नवजात शिशुओं पर कितना बुरा प्रभाव डालता है, इस समस्या को लेखक विभूति भूषण झा जी ने बहुत अच्छे ढंग से कहानी के माध्यम से उठाया है।
 
सुषमा मुनीन्द्र जी की कहानी, 'बना रहे यह अहसास', सतीश सरदाना जी की 'जिसका लगाया राज उसी का कौन काज, डॉ. जमुना कृष्णराज की 'अम्मालू' और डॉ. शिल्पा जैन की 'संस्कार' कहानियां हमें यह अहसास दिलाती हैं कि समाज में कितनी शीघ्रता से मानवीय और नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। जिन माता-पिता ने अपनी संतानों के पालन-पोषण के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, उन्हें जब बच्चों के सहारे की जरूरत पड़ी तो उनका बैंक बैलेंस मिलाया जाने लगा। मतलब अगर अम्मा के पेंशन के पैसे नहीं आते तो कोई उनका इलाज नहीं करवाता। सरदारजी को घर में रहने के लिए उनका मनपसंद कमरा नहीं मिलता और बेचारी बाल विधवा अम्मालू तो न घर की रही न घाट की। भाई-भतीजों पर अपनी कमाई का पैसा लुटाने के बाद भी उन्होंने न तो कभी उसे सम्मान दिया और न ही घर में स्थान। जहां पर वो काम करती थी, जरूरत पड़ने पर उन्होंने भी उसे भाइयों के पास वापस भेज दिया। 
 
इसी तरह 70 वर्षीय वृद्धा बसन्ती देवी को कुम्भ मेले के दर्शन करवाने का बहाना लेकर उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ देना और घर आकर उनके गुम होने की झूठी और मनगढ़ंत कहानी गढ़ना इस बात का प्रतीक है कि स्वार्थ पूर्ति के पश्चात् संतान किस हद तक गिर सकती है। 'संस्कार' कहानी का एक अच्छा पक्ष है बसन्ती देवी के पोते का संस्कारी होना, देश आते ही अपनी दादी की खोज में निकल जाना और अपने मां-बाप को ये नसीहत देना कि 'आप लोग चिंता मत कीजिएगा। मैं आपके साथ वो नहीं करुंगा जो आपने अपनी मां के साथ किया है क्योंकि मेरी रगों में खून के साथ-साथ मेरी दादी के दिए संस्कार भी दौड़ रहे हैं।' 
 
राम नगीना मौर्य की कहानी 'तुमने कहा जो था' बड़े दामाद के अहं के तुष्टिकरण की कहानी है। सच्चाई से अनभिज्ञ होते हुए दूसरों से द्वैष भाव रखना गलत है। समय के अनुसार स्थितियां भी बदलती हैं, उनके अनुसार स्वयं में परिवर्तन लाना ही बुद्धिमानी है, यही इस कथा का सार है। एम.जोशी हिमानी की 'कौन थी वह' यह संदेश देती है कि बिना देखे और सोचे-समझे किसी के बारे में राय बना लेना अनुचित है। हमेशा वेश्या की बेटी वेश्या ही हो, यह जरूरी नहीं है, वह आम लड़की की तरह आम इंसान हो सकती है। सुभाष नज्म की 'अधूरी ख्वाहिश' भी एक वेश्या की कहानी है, जो शादी करना चाहती है मगर जीत जी उसकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं होती। विजया शर्मा की 'रूप गर्विता' एक विकलांग लड़की और उसके स्वस्थ प्रेमी के विचलित मनोभावों की कथा है। विचार मंथन के पश्चात उसका प्रेमी उसे अपनाने को तैयार हो जाता है। देवांशु की 'शराबी' एक शराबी के नारकीय जीवन का वीभत्स चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानी है।
 
'मेरा दोस्त दिवाकर' वही मां-बाप की ख्वाहिशों की भेंट चढ़ने वाले बच्चे की कहानी है। एक बच्चे को उसकी इच्छा के विरुद्ध मैडिकल कॉलेज भेजना, असफलता से निराश होकर आत्महत्या की कोशिश और फिर फुटपाथ पर मिली पुस्तक को पढ़ने से उसकी जिंदगी बदल जाना, ये सब घटनाक्रम हमें बार-बार सचेत करते हैं कि बच्चों पर अपनी इच्छाएं नहीं लादनी चाहिए लेकिन हम हैं कि सुधरते ही नहीं। ममता झा की कहानी 'अपने' एक ओर जहां पैसे वालों के ईमान और विश्वास पर प्रश्नचिह्न लगाती है तो दूसरी ओर अपनों की ही अपनायत और नैतिक मूल्यों के पतन की गाथा गाती है। अपने 'जेब खर्च' के पैसे से यातायात पुलिस अंकल को पानी की बोतल ख़रीद कर देना एक छोटे बच्चे की उदारता और सहानुभूति को दर्शाती है। 
'लाज' लघुकथा इस बात का उदाहरण है कि समय पर किसी जरूरतमंद की सहायता करने पर वह लौटकर अवश्य ही आपके पास आती है। रंगनाथ द्विवेदी की 'भूख से मरे शायर का दीवान' मर्मस्पर्शी रचना है। जो शायर ज़िन्दगी भर बीड़ी बनाकर उसे बेचकर कागज के टुकड़ों पर कलाम लिखता रहा, उसके मरने के बाद उसकी नज्मों की पुस्तक ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और अब उसी के नाम से लाखों के मुशायरे होने लगे। कुमार गौरव की कहानी 'अनुवाद' का सार यही है कि प्रेम की भाषा का स्पर्श अनुवादक होता है।
 
'रोटी की खातिर' लघुकथा मानव की उस मजबूरी को दर्शाती है, जिसमें रोटी बनाने की खातिर जलावन के लिए श्मशान की लकड़ियां तक चुरानी पड़ती है। अंजू खरबंदा की 'नयी परिपाटी' बच्चों में पर्यावरण संरक्षण की भावना और उसको शुद्ध रखने के लिए सजगता की मिसाल पेश करती है। मयंक अग्रिहोत्री की 'सूरदास' मानव मन की विसंगतियों और सामाजिक विद्रूपताओं का दिग्दर्शन कराती है। 'झूठा आवरण क्षणिक चक्षु सुख दे सकता है, मगर स्थायी नहीं हो सकता', यही मूल भाव है मीरा जैन की लघुकथा 'सत्यमेव जयते' का। 'संतान' लघुकथा का मर्म ये है कि जो चीज किसी के लिए नुकसानदायक है वही दूसरे के लिए लाभदायक। किसान के सूखे खेत के लिए जहां बारिश लाभदायक है, वहीं राह चलते बीमार राहगीर के लिए वह मुसीबत का सबब बन जाती है।
 
'कितनी दूर' में पवित्रा अग्रवाल ने विदेश में बसे बच्चों और मां-बाप पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव को बहुत ही सुन्दर ढंग से चित्रित किया है। 'अव्यक्त प्यार' पिता का पुत्र के प्रति वह प्यार है, जो व्यवहार में कठोर लगता है लेकिन वास्तव में यह उसके जीवन निर्माण के लिए जरूरी होता है। श्वेता झा की 'जिम्मेदारी' हमें यह अहसास दिलाती है कि साथ में पढ़े हुए दोस्तों में से एक कितने ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाता है और दूसरा अपनी गैर-जिम्मेदाराना हरकतों के कारण जेल की सलाखों के पीछे। मनुष्य को अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ करना चाहिए। तारकेश्वरी सुधि की 'ममता' का सार यही है कि पशुओं में भी वैसी ही ममता होती है, जैसी कि इंसानों में।
 
कुन्दन कुमार की 'अधूरी कहानी' उस नायक की कहानी है, जो अपने प्रेम को अभिव्यक्त नहीं कर पाता और एक दिन उसकी प्रेमिका उसे इसी उधेड़बुन में छोड़ कर 'स्टुपिड' का खिताब देकर दूसरे शहर चली जाती है। डॉ.रजनी रमण झा की लघुकथा 'पड़ौस' प्यार की वही पुरानी दास्तान है, जो प्राप्त भी नहीं होता और भुलाने से भूलता भी नहीं। डॉ.संध्या तिवारी की 'नेमप्लेट' कहानी की नायिका के अंतर्मन की पीड़ा को दर्शाती अच्छी लघुकथा है।
 
सरिता सुराणा की लघुकथा 'आदर्श' उस पिता की बेबसी की कहानी है, जो स्वयं तो अपने आदर्शों का पालन करता है लेकिन समाज उन आदर्शों को नहीं मानता। इसी वजह से बिना दहेज दिए उसकी बेटी की शादी नहीं होती। 'समझ' इस बात को पुख्ता करती है कि अपने आस-पास घट रही घटनाओं को देखकर आजकल छोटे बच्चे भी कितनी जल्दी समझदार हो जाते हैं। मिथिलेश कुमारी की 'दहेज' मानव मन के लालच को दर्शाती अच्छी लघुकथा है। अन्य लेखकों की लघुकथाएं भी अपना संदेश देने में सफल रही हैं। सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
 
पुस्तक: 'इन्नर'
संपादक: विभूति भूषण झा
प्रकाशक: असम बुक ट्रस्ट, गुवाहाटी
सहयोग राशि: 200 रुपए
 
समीक्षक: सरिता सुराणा, हैदराबाद
 

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