ALL कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
काट रहे फ़रारी हैं
May 18, 2020 • अशोक 'आनन' • गीत/गजल

                  

*अशोक 'आनन'
 
चार   दीवारी   ही  चार   दीवारी  है ।
ऐसे  में  जीने  की  शर्त  लाचारी  है ।
 
द्वार , खिड़की , झरोखा -
न  घर  में संद है ।
घर  की  दरारों  का  भी -
आज मुंह बंद है ।
 
अपने ही घर में , काट रहे फ़रारी हैं ।
ऐसे   में  जीने   की  शर्त लाचारी है ।
 
तथाकथित अपनों का -
भरा     मेला     है ।
सुबह   से  शाम   तक -
मौत का खेला है ।
 
सिर पर तलवार , पांव तले आरी है ।
ऐसे  में  जीने  की  शर्त  लाचारी  है ।
 
द्वार , खिड़कियां गूंगी -
दीवारें  बहरी   हैं ।
अंधेरों    से    अपनी -
दोस्ती गहरी है ।
 
मन की पीड़ाएं भी , आज दु: खियारी हैं ।
ऐसे   में   जीने   की   शर्त   लाचारी   है ।
 
घर है साक्षी, दीवारों के -
मुंह कभी लगे नहीं ।
जी  भरकर  बतियाते  -
मिले ऐसे सगे नहीं ।
 
गीतों ने जिलाया , गीतों के आभारी हैं ।
ऐसे   में   जीने   की   शर्त  लाचारी  है ।
 
*अशोक 'आनन',मक्सी,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)
 

साहित्य, कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी लेख/रचनाएँ/समाचार अब नये वेब पोर्टल  शाश्वत सृजन पर देखेhttp://shashwatsrijan.comयूटूयुब चैनल देखें और सब्सक्राइब करे- https://www.youtube.com/channel/UCpRyX9VM7WEY39QytlBjZiw