ALL लॉकडाउन से सीख कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
जो अब तक मुझे,नित कहर-सी लगी
November 6, 2019 • प्रो.शरद नारायण खरे • गीत/गजल

*प्रो.शरद नारायण खरे*
जो अब तक मुझे,नित कहर-सी लगी ।
यकायक वो झिरिया,नहर-सी लगी ।
 
था बेनूर आलम,उजड़ा था उपवन,
वो प्यारा-सा नग़मा,बहर-सी लगी ।
 
जो रातों की स्याही,अमावस के पल थी,
वो पूनम का चंदा,सहर-सी लगी ।
 
नहीं कोई रौनक,नहीं थी मुहब्बत,
यकायक महल-सी,वो घर-सी लगी ।
 
मिरी भूल थी,उसको समझा नहीं था,
थी यह ही वज़ह ,वो ज़हर-सी लगी ।
 
बनी रुह की ताक़त,'शरद' हौसला वो,
मैं उड़ लूं गगन में,वो पर-सी लगी ।
 
*प्रो.शरद नारायण खरे,मंडला(मप्र)
 

शब्द प्रवाह में प्रकाशित आलेख/रचना/समाचार पर आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया का स्वागत है-

अपने विचार भेजने के लिए मेल करे- shabdpravah.ujjain@gmail.com

या whatsapp करे 09406649733