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झाँसी की रानी
June 18, 2020 • रामगोपाल राही  • कविता
*रामगोपाल राही 
लश्कर का मैदान पटा था 
शत्रु फिरंगी लाशों से  |
दिवस दिशा नभ धूमिल धूमिल ,
युद्ध अश्व की टापों  से ||
 
जख्मी रानी देख रुक गया ,
समय  भी  ठहरा ठहरा था |
रानी के संग खुद भी घायल ,
आहत हो गया घहरा  था ||
 
शत्रु पड़े -पीछे रानी के ,
समझो कुछ ही दूरी थी |
भारत के दुर्भाग्य काल की ,
नियति यह मजबूरी थी ||
 
तत्क्षण  सोचा रानी ने तन ,
नहीं फिरंगी हाथ लगे |
प्राणोंत्सर्ग भले कर  डालूँ  ,
पर न कलंकित  घात  लगे ||
 
हाथ निराशा शत्रु जिंदा ,
पकड़ सके ना रानी को |
तेजस्वी भारत की नारी ,
देश भक्त बलिदानी को ||
 
वक्त थमा था  -पवन ठगा सा, 
 -ठिठक दिशाएँ  रही खड़ी |
आसमान उठ बैठा बोला ,
क्यों आयी  ओ काल घड़ी || ?
 
संध्या किरणों से सूरज ने ,
कफन उड़ाया रानी को |
अमर रहे बलिदान तुम्हारा ,
बोला वीर भवानी को || 
 
स्वतंत्रता - शंखनाद कर ,
मिट गई वीर भवानी थी |
शंख फूँक के गई जगा वो -
 - झाँसी वाली रानी थी || 
 
तिथि 18 जून दुखद दिन ,
उसके बलि  हो जाने का |
शोक में सबके  -आंखों में ,
आँसू भर भर आने का || 
 
लश्कर केम्पू  मैदान में ,
चिता जली थी रानी की |
फैली चर्चा चहुँ  दिशा में ,
अमित कहानी रानी की || 
 
मरी मिटी रानी तो लेकिन ,
देकर यह संदेश गई |
मातृभूमि  व देश बढ़कर ,
होता व्यक्ति विशेष नहीं ||
 
कभी-कभी ही वीर  नारियाँ ,
 मुश्किल से हो पाती है |
 देश भक्ति में जीवन देकर 
अपने प्राण लुटाती है ||
*पो. लाखेरी ,जिला बूंदी (राज) 
 

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