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जीवन-पथ
July 2, 2020 • डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी • कविता

*डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी 

जीवन पथ पर, पथिक है चलना।
राह में राही, सबसे है मिलना।
पथिक तो  आते, जाते रहते,
रूकना नहीं, है अविरल चलना।

आधा जीवन बीत रहा है।
नहीं, कभी संगीत रहा है।
हमने सब कुछ लुटा दिया,
फिर भी साथ न मीत रहा है।

साथ में जो भी, मीत ही समझो।
नहीं किसी से, कभी भी उलझो।
जीवन तो है, भूल-भुलैया,
सोचो, समझो और फिर सुलझो।

यहाँ, कोई तेरा मीत नहीं है।
हार-जीत, संगीत नहीं है।
पल-पल जी ले, तू मुस्काकर,
रोना यहाँ की, रीत नहीं है।

जीवन को क्यों काट रहे हो?
सुख को भी, दुख बाँट रहे हो।
दुख्खों के घेरे से निकलो,
व्यर्थ ही, खुद को डाँट रहे हो।

जीवन का आनन्द लुटाओ।
विध्वंसों में मौज मनाओ।
धोखा देना, फितरत उनकी,
धोखा खाकर, जश्न मनाओ।

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