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जीवन कौशल
March 19, 2020 • डॉ. साधना गुप्ता  • लेख


*डॉ. साधना गुप्ता 
        
किसी भी समस्या का समाधान समस्या के ज्ञान पर निर्भर करता है, इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों को प्रार्थना करनी पड़ी - ‘‘धियो योनः प्रचोदयात्’’। प्रचोदयात् अर्थात् सही तरीके से सोचना।

इस विषय को समझने के लिए हमें मूल से यात्रा प्रारम्भ करनी होगी। माँ से नवजातक का जीवन नाभिनाल से जुड़ा होता है अतः उस महान ज्योतिषमान शक्ति का संचालन केन्द्र हमारे शरीर में नाभि है ठीक वैसे ही जैसे पावर हाऊस की बिजली का संचालन स्विच से होता है। इस नाभि के दो भाग- प्राणशक्ति व मन है। प्राणशक्ति श्वास द्वारा स्क्त शुद्धि, अन्न-पाचन इत्यादि शरीर सम्बन्धि समस्त कार्य करती है। मन में शक्ति नहीं होती, केवल गति होती है। जैसे बिजली में केवल करंट। जहाँ लगा दें, वहीं चलने लगती है। हमें इस मन को ही समझना होगा।

मन - वस्तुतः मानव मनु की संतान होने के कारण मानव नहीं कहलाता वरन् मन के होने से मानव कहलाता है। यही कारण है कि मानव ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जो अपनी फिलिंग देखने में सक्षम है। अर्थात् जब आपको क्रोध आता है तो आप यह अनुभव कर सकते हैं कि आप क्रोध में हैं। बस उसके साक्षी बनें, गुलाम नहीं। इसीलिए कहा गया है - आनन्द में वचन मत दीजिए, क्रोध में उत्तर मत दीजिए, दुःख में निर्णय मत लीजिए, इतना छोटा कद रखिए कि सभी आप के साथ बैठ सके और इतना बड़ा मन रखिए कि जब आप खड़े हो जाऐं, तो कोई बैठा न रह सके। अतः अपने हालात से ऊपर उठ पाने की योग्यता जाग्रत करें, - इस विषय में सम्यक चिन्तन करना ही विचार का बिन्दु है।

मनुष्य शरीर में मन ऐसी शक्ति है जिसे जीत लिया तो आप सब कुछ हैं, नहीं हो असंख्य प्राणियों में एक। परन्तु परेशानी का विषय यह है कि मन दिखता नहीं है, - जो स्मृति रखता है, याद रखता है, प्रयास करता है, सोचता है, निर्णय लेता है, यहाँ तक कि जीवन व शरीर के तमाम कार्य करता है। तभी तो मन संतुलित है तभी तक व्यक्ति समाज के काम का है। 

प्रज्ञा - अर्थात् ‘बुद्धि’ मन का ही परिष्कृत रूप है जो अच्छे-बुरे का विचार कर निर्णय कर लेगी। मूल रूप से है यह भी माया का ही एक रूप जो कार्यक्षमता, कार्यकुशलता में वृद्धि कर सांसारिक रूप से हमें काफी ऊँचा उठाती है परन्तु, साथ ही अहंकार में भी वृद्धि करती है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे सूर्य के ताप से निर्मित बादल ही सूर्य को ठक लेते हैं। अतः इसे विवेक में परिवर्तित करने की बात भी की जाती है क्योंकि तब यह शतप्रतिशत शुद्ध होती है। समस्त कामनाएँ, स्व-पर की भावना से मुक्त होती है। इसके लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है - सत्संग करना, अर्थात् अपने से जो श्रेष्ठ है उसकी संगति, उसके निकट रहना, जिससे हममें उसके गुण आए। रामचरितमानस में कहा भी है - ‘‘बिन सत्संग विवेक न होई’’।

विवेक एवं आत्मसाक्षात्कार - यह इतना आसान नहीं है। इसके लिए शनै-शनै बाहर से अन्दर की यात्रा करनी होती है। मन का इन्द्रियों से संबन्ध तोड़ना होगा अर्थात् समाधि, तब यह मन नाभि की ओर जाएगा जिसे अन्तुर्मुखी होना कहा गया है। इसी के लिए भगवत् गीता में पार्थ सारथि का अर्जुन को आह्वान है ‘‘मामनुस्मर युद्ध च’’ अर्थात् निरन्तर मेरा स्मरण करके युद्ध कर। वस्तुतः प्रतिमाएँ तो जनता को समझाने के लिए प्रतिकार्थ रूप में बनाई गई है। ‘माम्’ शब्द का अर्थ है - ‘‘सोऽहम्’’। ‘‘वो में हूँ,‘‘ जो अन्दर से बोल रहा हैं इसी को भारतीय संस्कृति में आत्मसाक्षात्कार कहा गया है। यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यह स्मरण यदा-कदा नहीं, सर्वकालेषु अर्थात् निरन्तर हो। ‘‘निः$अन्तर’’, दो हिस्सों में जहाँ अन्तर नहीं, धारा प्रवाह, ठीक तेल की धारा ‘‘वसुधारा’’ के समान जो निरन्तर प्रवाहमान रहे। जरा भी बीच में अन्तर हुआ तो वह बन्द हो जाएगी। इसके लिए क्या करें ? कैसे करें, यह यक्ष प्रश्न है जिसका सहज समाधान प्रस्तुत करने का लघु प्रयास यह आलेख है

मार्गदर्शक या गुरू - जहाँ तक गुरू या मार्गदर्शक की बात है, सच्चा मार्ग दर्शक मिलना कठिन ही नहीं दुर्लभ है क्योंकि किस विषय में सोचना है यह कोई नहीं बताता। सब, कैसे सोचना है यह बताते हैं क्योंकि उनका विचार है कार्य सोचने से होता है। यह बात सत्यनारायण की कथा में मूल कथा के न होने के समान ही है। वस्तुतः हमें एक सच्चा मार्गदर्शक चाहिए, जो हमें बताए - ‘‘ हम किस विषय में सोचें’’ - ‘‘A Ture master is needed so that he may guide us how to think’’ और यह गुरू हमारे अन्दर है, बाहर नहीं। अन्तर्मुखी होने के बाद जो मार्गदर्शन होगा वही माया से छुटकारा दिलाएगा जबकि बाहरी मार्गदर्शक माया में भटकाएगा। स्वामी रामकृष्ण ने कहा भी है - ‘‘प्रकृति स्वयं अपने अन्दर से प्रेरणा देकर मार्गदर्शन करती है, वही गुरू है।’’ क्योंकि आध्यात्मिक साधना में मन, बुद्धि, शरीर का कोई सम्बन्ध नहीं, शारीरिक क्रियाओं से परे सक्रिय मन को निष्क्रिय करना होता है। प्रकृति की दोहरी भूमिका, -एक ओर हमसे अच्छे कार्य की अपेक्षा व दूसरी ओर मन में विकार पैदा कर बुद्धि को चलायमान करना, से मुक्त रखने के लिए अन्तर्मुखी होने की योग्यता ही सही मार्गदर्शन करती है। अतः सर्वप्रथम हमें अपनी आत्मिक शक्ति को जागृत करना होगा। इसके लिए कही गई बात को प्रयोग करके देखें, क्योंकि कहने वाले में जो शक्ति है, वह हममें भी है तथा जो समस्या सामने है उसका मुकाबला यदि सीना तान कर किया जाए तो वह आगे आएगी ही नहीं, ऐसे ही निकल जाएगी। वस्तुतः कोई भी समस्या अपनी योग्यता को परखने का, परिचय देने का मौका हमें प्रदान करती है जिसमें हमें हारना नहीं, जीतना है, - यह संकल्प होना चाहिए, अतः निर्भय होकर मुकाबला करो,- आपकी जीत होगी, पर भाग कर जाएगें तो हार। समुद्र में लकड़ियाँ बहकर एक जगह इकट्ठी हो जाती है, पीछे से धक्का आता है लहरों का तो फिर सब चारों ओर बिखर जाती है। इस संसार रूपी प्रवाह में सब वस्तुएँ, परिस्थितियाँ इसी प्रकार एकत्रित हुई हैं, विश्वास रखिए, बिखर भी जाएगी अतः मूल मंत्र है -‘‘वर्तमान में रहो’’।

मूल मंत्र - ‘‘वर्तमान में रहो’’ -  भविष्य जितनी तेजी से वर्तमान में उतरता है उतनी ही तेजी के साथ अतीत बनकर बह जाता है, अत मूल मंत्र है, -‘‘वर्तमान में रहो’’, ‘‘हमेशा मुस्कराते रहो’’, हर परिस्थिति में प्रसन्न रहो’’। वर्तमान में रहने से विवेक जाग्रत होता है। विवेक जाग्रत होने से आपकी संकल्प शक्ति बढ़ जाती है, आत्मविश्वास प्राप्त होता है, जबरदस्त आत्मविश्वास। अपना आत्मविश्वास ऐसा जाग्रत करों जिससे कार्य करने की व्यावहारिक कुशलता के लिए शक्ति अपने आप प्राप्त हो। शारीरिक श्रम मजदूर करता है। मानसिक रूप से परिपूर्ण विकसित बुद्धिमान व्यक्ति बैठकर काम करता है और संकल्पवान मात्र संकल्प से काम करता है, अतः 'Think and it will happen' ‘‘संकल्प करों और वह पूर्ण होगा’’ तथा ‘‘Think once and decide once and never give it a second thought‘‘ ‘‘एक ही बार सोचकर निश्चत करलो, विकल्पों के उहापोह में न पड़ो।’’ वर्तमान में रहने के लिए, - ‘‘जो हो रहा है, उसे देखो बस’’। बौद्धों की ‘‘विपश्यना’’ क्रिया इसीलिए है जिसमें ध्यान को श्वास क्रिया पर केन्द्रित करने की बात कही गई है। कबीर ने इसे ‘‘सहज समाधि’’ संज्ञा से अभिहित किया है। मंत्र विज्ञान में त्रिकुटी पर ध्यान केन्द्रित करना कहा है और योग में चित्रवृत्ति निरोध, - ‘‘योगः चित्तवृत्ति निरोधः’’। चित्त = मन, वृत्ति = भटकाव, निरोध = रोकना अर्थात् मन जो निरन्तर भटकता है उसका निरोध करना योग है। इसके लिए अनिवार्य है सतत जागरूकता।

सतत जागरूकता - (Constant awareness) - जड़ रस्सी को सर्प समझ कर हमारे अन्दर धड़कन की गति को तीव्र करना मन का काम है। बाह्म संसार की हलचल संस्कार, तरंगे Waves) मन से आकर टकराती है। अतः ‘‘मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मुच्यते’’। यह मन केवल गति रूप होता है। उसमें विकार, कार्य करने की क्षमता या प्रेरणा बाहर से आती है जिसे हम संस्कार कहते हैं। घटनाओं को देखना, उनसे विचलित नहीं होना, ‘‘जीवन मुक्त अवस्था’’ है। इस हेतु मन पर निगरानी (Constant Watch) रखना जरूरी है। सतत जागरूकता (Constant awareness), कि मन भटके नहीं। पुनः स्मरण रखना है आध्यात्मिक साधना में मन, बुद्धि, शरीर का कोई सम्बन्ध नहीं। शारीरिक क्रियाओं से परे सक्रिय मन को निष्क्रिय करना है। जिसके लिए आवश्यक है - मानसिक मौन।

मानसिक मौन - मानसिक मौन ही सच्चा मौन है। यह जब एक निश्चित सीमा तक पहुँच जाता है तो उस मन से कुछ तरंगें जैसी निकलती है, जो सीधी दूसरे के मन में जाकर उस मन को प्रेरित करती है। प्रेरणा देती है कि वह भी इसी प्रकार मौन रहकर शंकाओं का समाधान पा सकता है। मानसिक मौन रहने से उस परमात्मा द्वारा आने वाले संदेश को वह व्यक्ति ग्रहण कर सकता है, सत्संग में आए अन्य व्यक्तियों को प्रभावित कर सकता है, संदेश उन तक ही नहीं दूर प्रवासी व्यक्ति तक भी पहुँचा सकता है। अतः मौन सत्संग मन को शुद्ध, पवित्र करने वाला, विराट से प्राप्त होने वाले संदेशों को प्राप्त करने वाला, समझने की क्षमता विकसित करने का श्रेष्ठ साधन है जिसे हम ‘‘टेलिपेथी’’ के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। इसकी सिद्धि के लिए आवश्यक है - सतत प्रयत्नशीलता।

सतत प्रयत्नशीलता - कोरे आशीर्वाद से कुछ नहीं होता, साधना की सिद्धि सतत प्रयासरत होने में है अतः प्रयास बढ़ाना चाहिए क्योंकि ईश कृपा और आशीर्वाद फलित होते अवश्य है, पर उसके साथ-साथ स्वयं के प्रयत्न भी जारी रहना चाहिए- ‘‘नहि सुपतस्य सिहस्य प्रविष्यन्ति मुखे मृगाः। अतः अपने धर्म का पालन करते हुए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए।

स्व धर्मः -  धर्म अर्थात् स्वभाव, कर्त्तव्य। जैसे पानी का धर्म है बहना, क्षत्रिय का युद्ध करना। अपने धर्म का पालन करना चाहिए क्योंकि दूसरे का धर्म अपनाना अर्थात् प्रकृति ने तुम्हें जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु भेजा है, जो कार्य दिया है, जो वस्त्र पहन कर अभिनय करने को कहा था, उन्हें छोड़ तुमने दूसरे वस्त्र पहने, दूसरा पार्ट खेलना प्रारम्भ कर दिया, तो सोचो, नाटक का क्या होगा? 
सार रूप में शरीर पंच महाभूतों का है, हमेशा सक्रिय रहेगा, उसको सक्रिय रखो। शरीर व आत्मा को जोड़ने वाली कड़ी है ‘‘मन’’, उस मन को अलग रखो - तटस्थ। जिसके लिए वर्तमान में रहना आवश्यक है अतः वर्तमान में रहकर मन को नियन्त्रित करो। तब नियन्त्रित रहने के बाद आपको तमाम प्रश्नों के उत्तर अन्दर से ही प्राप्त होंगे, बाहर से नहीं। बाहर के उत्तर धोखा है जो माया से आए हैं। तो माया में नहीं, ब्रह्म में जाओ। यही गीता का ‘‘स्थित प्रज्ञ’’ होना है। 

*डॉ. साधना गुप्ता ,झालावाड़ (राज.)

 

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