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जीने की राह
May 24, 2020 • विनय मोहन खारवन • लेख

*विनय मोहन खारवन

दो तिनके नदी की धार में बहते जा रहे थे।एक मजे से, खुशी खुशी धार के साथ बह कर उछलता कूदता, गीत गाता हुआ जा रहा था। प्रभु का धन्यवाद कर रहा था।वहीं दूसरा तिनका परेशान, रोता, झींकता बह रहा था। वो भगवान को इस जीवन के लिए कोस रहा था। उसकी शिकायतों का पिटारा खत्म ही नही हो रहा था। पर नदी की तेज धार के समक्ष किसकी चली जो इसकी चलती। नदी जा के अपनी मंजिल यानी सागर में जा कर समा गयी।साथ ही दोनों तिनके भी समुद्र में समा गये। एक तिनका हँसते, मुस्कुराते सफर तय करता है, वही दूसरा दुखी, परेशान , रोता, शिकायतें करते करते अपना सफर को तय करता है।लेकिन हैरानी की बात ये की दोनों की मंजिल एक ही थी।दोनों सागर की अथाह गहराइयों में समा गए।
 
ये दो तिनके प्रतीक हैं दो प्रकार के मनुष्यों के। यानी एक ऐसा जो हर हाल में खुश हैं।उसने सीख लिया है कि सुख है तो भी ,दुःख हो तो भी, जिंदगी तो हर हाल में जीनी है तो क्यों न इसे उत्सव की तरह जिया जाये।क्योंकि दुखी होने से किसी समस्या का हल नही निकलने वाला।उल्टा परेशानी में हमारा दिमाग भी काम करना बंद कर देता है।कुछ बातों पर हमारा बस नही चलता। किसी शायर ने कहा है कि ,'बात गर समझ न आ सके तो हाल पे वक़्त के छोड़ दो', समझदारी भी इसी में है कि कभी कभी नासमझ बनना भी एक समझदारी होती है। अगर मन का हो तो अच्छा, न हो तो और भी अच्छा।क्योकि उसमे ऊपर वाले कि इच्छा शामिल होती है।
 
दूसरी प्रकार के मनुष्य वो है जिन्हें हर हाल में दुखी रहना है। वो दुखी होने के बहाने ढूंढते हैं।जरा सी समस्या आते ही उनका कुढ़ना व परेशान होना जन्मसिद्ध अधिकार होता है।घर मेहमान आ गये तो उनकी बड़बड़ाहट शुरू हो जाती है। उनकी सेवा भी करेंगे, उनके आगे नकली चेहरे से हंसी भी दिखायेंगे।पर अंदर ही अंदर कोस रहे होते हैं।यही काम हंसी खुशी, बिना कुड़े भी हो सकता था।फर्क सोच का है।इस प्रकार के लोग हर जगह नकारात्मक चीजें ही ढूढ़ते हैं।इन्हें हर चीज से शिकायत होती है। हर वक़्त भगवान को ताने देते रहेंगे की हे भगवान तूने ये नही दिया, तूने ऐसा क्यों कर दिया आदि आदि।
 
क्या हम सुबह उठ कर ईश्वर का धन्यवाद करते हैं कि हे प्रभु तूने हमें हवा, पानी और इस शरीर को दिया है। एक वेंटीलेटर पर लेटे व्यक्ति से पुछिये की ऑक्सीजन की कीमत क्या है। डायलिसिस पर पड़े इंसान से पुछिये की किडनी कितना कीमती है।पर हम उसकी कदर नही करते, क्योकि हमें फ्री में जो मिला है।जो है उस का धन्यवाद करना सीखिये, फिर देखें जिंदगी कैसे बदल जाती है।शिकायत करना छोड़ कर जो है उसका धन्यवाद कीजिए। वरना किसी दिन जो है वो भी नही रहेगा तो क्या करोगे। रात के बाद दिन व दिन के बाद रात तो आनी ही है।सुख है तो दुख के लिए तैयार रहें।अगर दुख है तो उम्मीद रखियेगा की सुख का आगमन होने वाला है।
 
*विनय मोहन खारवन,जगाधरी,हरियाणा
 

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