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जन कवि नन्दी लाल
September 4, 2020 • ✍️सुरेश सौरभ • लेख
जन कवि श्री नन्दी लाल की रचनाएं मानवीय सरोकारों के गहरे धरातल से जुड़ी हुईं हैं। 25 जुलाई 1957 में नई गढ़ी पो0 भरौना सिधौली सीतापुर में जन्में नन्दी लाल जी के अंदर छुटपन से ही काव्य सर्जना के बीज अंकुरित होने लगे थे, जब वह कक्षा तीन में पढ़ते थे। इनकी माँं स्वः चन्द्रावती और पिता स्वः रेवती राम ने अपने रचनात्मक कौशल से इनका पालन-पोषण किया। इनके पिता साहित्य के बहुत रसिक जीव थे। घर पर ही उन्होंने गीता, महाभारत, पुराण, रामचरित मानस, आल्हा खण्ड जैसे असंख्य कालजयी पुस्तकों का संकलन कर के रखा था, जिनका अनुशीलन करते हुए बचपन से ही नन्दीलाल जी के मन में सृजन के और गहरे बीज अंकुरित होते चले गये, जिसके फलस्वरूप जब वह आठ साल थे, तभी से दोहे लिखने लगे और अपने स्कूल के शिक्षकों को दिखाने लगे। शिक्षकों के प्रोत्साहन से उनकी अनवरत कलम सृजन में सक्रिय रही। कुल चार भाई-बहनों में आप के छोटे भाई मुरली धर “धर“ जी भी एक श्रेष्ठ कवि थे, जिनके प्रोत्साहन और उत्साहवर्धन से इनके रचनात्मक कौशल में निरन्तर श्रीवृद्धि होती रही। बाइस साल की आयु से आप ने हिन्दी की गोठिष्यों में अपने रचना कौशल से सबको अभिभूत करना शुरू कर दिया। 1981 से लेकर 1984 तक आप ने सिधौली में  अध्यापन का कार्य किया। जनवरी 1985 में इलाहाबाद यूपी ग्रामीण बैंक में आप अधिकारी के पद नियुक्त होकर छोटी काशी गोला में आये फिर यहीं के होकर रह गये। काव्य की सभी विधाओं में पारंगत श्री नन्दी लाल जी ने सैंकड़ों दोहे, ग़ज़लें, गीत, छंद, लोकगीत आदि लिखे। देश एवं प्रदेश के कोने से निकलने वाली पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर इनकीं कविताएं प्रकाशित हो रहीं हैं। काव्य रथ मासिक का बरसों से संपादन-प्रकाशन करते हुए सृजन की नई एवं पुरानी पौध को आप निरन्तर सींचने का भी महनीय कार्य कर रहें हैं। देश की तमाम नामी-गिरामी संस्थाओं से सम्मानित नन्दी लाल जी वास्तविक सम्मान अपने पाठकों और श्रोताओं का प्यार-दुलार ही बतातें हैं। आप का हज़ल संग्रह जमूरे आफिस हैं और गजल संग्रह आंगन की दीवारों पर प्रकाशित हो चुकें है। जिसकी हिंदी साहित्य में निरन्तर चर्चा हो रही है। आप की नौटंकी शैली में बाइस कथानक, छंद शैली में सुदामा चरित, बुलाका बत्तीसी, पनही पचीसी, कजरा बावनी जैसी शोधपरक रचनाएं प्रकाशन की बाट जोह रहीं हैं। इनकीं कविताओं में गेयता है, लयता हैं, मार्मिकता है, सहृदयता है, इसके साथ ही सहज और सरल लोक भाषा शैली का मजबूत विन्यास भी है। लगभग पचास साल की सहित्यिक साधना में आप अपने नाम के पीछे उपनाम 'निराश' लिखते रहें हैं, पर जिंदगी की जद्दोजहद में वे कभी निराश नहीं रहें, उनकी आशावादी रचनाएं हमेशा हताश निराश जनता को उत्साहित उल्लासित करतीं रहीं हैं, तभी वह कहतें हैं
नहा करके जहां माहौल घर-घर का बदलता है।
हमारे गांव से एक प्यार का दरिया निकलता है।।
*सुरेश सौरभ 
लखीमपुर-खीरी
 

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