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जगत में साँवरो ही सेठ एक  देख्यो मैंने 
July 24, 2020 • ✍️रविकान्त सनाढ्य • दोहा/छंद/हायकु
✍️रविकान्त सनाढ्य
तुर्रा औ कलंगी खूब झलकारो मारै सीस , 
वेस केसरी की सोभा  महा छविमान है l
दूलह बने से ओप रहे होे कन्हाई आप
रासधारी हमें तो पै बड़ो़ अभिमान है l 
एक ही अकेलो तू  तो रसिया छबीलो छैल, 
सबसे अलग तेरी मतवाली शान है l 
कहै रविकंत तू है दिल को लुटेरो बड़़ो,
चैन छीन लेवै  कैसी  अपनाई बान है ll
 
देवदूत पुष्पवृष्टि कर रहे आप पर , 
गजों का भी अभिषेक बढ़ा रहा शान है ।
फुलकारी आजू -बाजू सोह रही रंगमय , 
चाँदनी का दो --दो चन्द्र करैं आह्वान हैं ।
लाल,  लाल पिछवाई अरुणिमा लसत है , 
पीत बाने उदै हुओ जैसे आज भान है ।
कर में गुलाब स्वेत जम रह्यो खूब देखो , 
खिले हैं कमल यहै खास पहचान है ।।
 
ललन लहरदार वेस धरि लीनो आज 
मुकुट  गुलाब  सों सजीलो शानदार है l
आभरण स्वर्ण औ रजत के हैं मनोहारी,
मणिमाल पुष्पमाल बनी जानदार है l 
केसर- कस्तूरी को तिलक तेरे भाल सोहै,
हीरे की तो आभ प्यारै अति दमदार है ।
जगत में साँवरो ही सेठ एक  देख्यो मैंने 
जग है तिहारै बल, तू ही  मालदार है ।
 
*भीलवाड़ा
 

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