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इस युग की सबसे बड़ी लाचारी , कोरोना से आयी हुईं महामारी
April 4, 2020 • तनूजा कादरे • लेख

*तनूजा कादरे

 बचपन से लेकर आज तक महामारी शब्द जब भी सुना तो केवल कल्पना से ही डर लगता था,आज जब इस महामारी का भयानक रूप देख रही हूं तो हतप्रभ ,परेशान और हैरान हू।इस तरह से इन्सान मर रहे है जैसे पतझड़ के पत्ते गिर रहे है।आज यह कैसी विडम्बना है की बड़े बड़े सशक्त एवम संपन्न राष्ट्र भी इसके सामने घुटने टेकते दीख रहे है।

इस सबका एक बड़ा कारण यह नजर आ रहा है की मानव आज मानव का कातिल हो गया है,डार्विन के सिद्धान्त का सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट याने बड़ी मछली छोटी को निगल रही हैं,यह मानव जाती में सत्य होता जा रहा है। मनुष्य अब जानवर की प्रजाती जैसा ही हो गया है।

चीन ने दूसरे देशों के सहारे अपने आप को मजबूत किया है और अब पूरे विश्व पर राज करने के इरादे है और वह भी अन्याय पूर्ण तरीके से। इसी चीन को आज यह याद नहीं  की यू. एन. में आने से सभी देशों ने हमेशा से ही विरोध किया इसकी वजह यही रही की चीन का पूर्व इतिहास है कि उसने हमेशा धोका किया और आज  कोरोना जैसी महामारी इसी देश की देन है।

सभी देशों को यह हक है कि वे हैल्थी प्रतिस्पर्धा करे परन्तु प्रकृति का दोहन कर उसे नुकसान पहुंचाने का काम करने का अधिकार किसी को भी नहीं है। प्रकृति पर सिर्फ और सिर्फ ईश्वर का ही अधिकार है मानव किसी के जीवन से नहीं खेल सकता, यही काम चीन ने किया है और अब यह समय आ गया है की इस पर गहन चिंतन हो ।

आज नहीं तो कल इस महामारी का अंत होगा और लाचारी का खात्मा हो ही जायेगा परन्तु विश्व को दहलाने वाली इस घटना को युग युग तक भुलाया नहीं जा सकता, इसकी जड़ को काटने की पहल करनी ही होगी अन्यथा ऐसे ही निर्दोषों का दमन होता रहेगा  और उन्हें दम तोड़ना होगा।

इटली स्पेन फ़्रांस जैसे शांतिप्रिय  देशों में आज लाखो की तादाद में लोग पीड़ित हो गए है,हजारों मौत के मुंह में चले गए , अमेरिका जैसा देश ध्वस्त होने की कगार पर है  भारत त्रस्त हो रहा है ,क्या है ये…..

मानवता का अंत ही तो है।मानवता से ता न होगी तो मानव सिर्फ संज्ञा बन कर रह जाएगा आने वाली पीढियां जब  इस विडम्बना का जवाब मांगेगी तो वह निरुत्तर, निशब्द,निश्चेतन बनकर रह जाएगा।

आओ मिलकर एक संकल्प ले कि ,आज जिस हालात से हम लड़ रहे हैं इस लड़ाई का अंत इसके जड़ को उखाड़कर ही होगा,अब हम चुप नहीं बैठेंगे। आज एक एक क्षण इस त्रासदी का गवाह हैं और इसके रोज के मौत आंकड़े एक टीस निर्माण कर रहे है।हमें सचेत होना ज़रूरी है और अब इस विषय पर गहन शोध जरूरी है ।

*तनूजा कादरे, उज्जैन

 

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