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इक्कीसवीं सदी और साहित्यिक विमर्श पर हुआ संगोष्ठी का आयोजन
December 2, 2019 • डॉ. कल्पना मौर्य • समाचार

दो दिवसीय चिन्तन, मनन, मंथन विमर्श संगोष्ठी प्रतिवेदन।
उच्च अध्ययन शिक्षा संस्थान (मानित विश्वविद्यालय), मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के हिन्दी विभाग, गांधी विद्या मन्दिर, सरदारशहर, चूरू (राज.) द्वारा दिनांक 8-9 नवम्बर, 2019 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्धाटन डॉ. सदीप अवस्थी एवं डॉ. ब्रजरतन जोशी के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. संदीप अवस्थी ने 21 वी सदी और साहित्यिक विमर्श धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। बडे़ शहरों पर पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति का प्रभाव ज्यादा है। डॉ. अवस्थी ने दलित, आदिवासी परिवार और थर्ड जेंडर विमर्श पर भी अपने विचार व्यक्त किये। राजस्थान साहित्य अकादमी के सम्पादक डॉ. ब्रजरतन जोशी ने कहा कि ज्ञान क्रिया के बिना भार स्वरूप है। डॉ. जोशी ने साहित्यमें विमर्श के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उद्धाटन सत्र को संबोधित करते हुए सत्र अध्यक्ष हिमांशु दूगड़ ने कहा कि स्त्री-पुरूष समानता का बिन्दु परिभाषित हो। मानव जाति एवं मानव धर्म पर विमर्श किया जाये साथ ही हिन्दी भाषा के शब्दकोष में नवीनीकरण के लिए सुझाव दिया। उन्होनें थर्ड जेंडर विमर्श पर भी अपने विचार व्यक्ति किये। समाज में उनकी स्थिति क्या है? और इनकी अपनी समस्यायें क्या है? उन्हें कैसे न्याय मिले इस पर भी चर्चा की। कुलपति डॉ. दिनेश कुमार ने कहा कि भारतीय संस्कृति में स्त्री-पुरूष का भेद था ही नहीं। यह तो कालान्तर में विदेशी आक्रमणों के कारण भारत में आया। वो स्त्री तो गृहस्वामिनी थी। प्रो. देवेन्द्र मोहन ने हिन्दी साहित्य के 20वीं सदी के साहित्यकारों की विशेषताओं से परिचित करवाया डॉ. कल्पना मौर्य, संगोष्ठी समन्वयक ने अतिथि परिचय, संगोष्ठी परिचय एवं स्वागत उद्बोधन प्रदान किया
उद्घाटन-सत्र में सभी राज्यों से आऐ हुये अतिथियों, प्रतिभागियों, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की निहारिका मालवीय (स्वीडन), डॉ. शिवानी हर्डिया (डेनमार्क), मुन्नालाल हर्डिया (परीक्षा नियन्त्रक, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर, म.प्र.), डॉ. शेखर (आई.टी कॉलेज), प्रो. टी.जी. बिकार्या (राजकोट, गुजराज), डॉ. बीना शर्मा (कर्नाटक) तथा विभाग से सभी गणमान्य  सदस्य उपस्थित थे।
द्वितीय सत्र 21वीं सदी और दलित विमर्श (उप-विषय) 
तकनीकी सत्र अध्यक्ष ब्रजरतन जोशी, राजस्थान साहित्य अकादमी, मधुमति पत्रिका के सम्पादक ने अपने ज्ञानरूपी प्रकाश से की। संदर्भ व्यक्ति के रूप में डॉ. सुमेर सिंह ने अपनी भूमिका निभाई। इस सत्र की रिपोर्टिंग ललिता शर्मा एवं उमा सैनी ने की। तकनीकी सत्र की विवेचना करते हुए अंग्रेजी में उसका अर्थ डिस्कोर्स बताया जिसका की हिन्दी अर्थ तार्किक विवेचन, परीक्षण के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने अंग्रेजी में विमर्श के चार प्रकार बताए -
पहलाः- इक्सपोजिशन, दूसरा नरेशन तीसरा डिस्क्रिप्शन और चौथा आर्ग्युमेंट । डॉ. जोशी ने साहित्यिक विमर्श को भी तीन भागों में विभाजित किया पहला काव्यात्मक, जिसे हम पौलिटिक डिसकोर्स भी कहते है, दूसरा अभिव्यक्ति मूलक और तीसरा विनियम मूलका। उन्होंने कहा कि आज विमर्शो में परंपरागत मान्यताओं के खण्डन की प्रवृत्ति बढ़ रहीं है। आज वर्गीय स्मिता ने साहित्य में अपना स्थान बना लिया है । दलित विमर्श और स्त्री विमर्श बढ़ते हुए व्यक्तिवाद और अस्तित्ववाद की देन है । उन्होंने आज के संदर्भ में चार सुझाव दिए है : पहला अमर्त्य सैन का सर्व समावेशी कारण, दूसरा भीकू पारीक का बहुत संस्कृतिवाद, तीसरा अतः संस्कृतिवाद और चौथा परासंस्कृति वाद या ट्रांस कल्चरलिज्म। आज परासंस्कृतिवाद अर्थात् ट्रांस कल्चरलिज्म ही विभिन्न विमर्शों के बीच में आपसी मेल-जोल के रूप में सेतु का कार्य कर सकता है। 
 डॉ. सुमेर सिंह ने कहा-दलित साहित्य में हजारो सालों से मूक बने जनमानस को वाणी दी है, संघर्ष की चेतना उत्पन्न की है, साहित्य को समाज से जोड़ा है। दलित साहित्य ने नये बिंब गढ़े, पौराणिक मिथकों की परिभाषा बदल डाली, नए मिथक बनाए, झूठ और आस्था पर चोट की और चमत्कारों को तोड़ा । इसके दायरे में अंधविश्वास, भाग्य, पुनर्जन्म के कर्म, धर्म या भगवान नहीं आते। यह प्रत्यक्ष यर्थाथ् से मुक्त है, जीवंत है । दलित रचनाओं में पंचायती राज का नाम यर्थाथ पूरी शिद्दत के साथ उद्घाटित होता है । दलित विमर्श के अन्तर्गत दलित साहित्यकारों के द्वारा सामाजिक संरचना की तह में छिपे षडयंत्र और प्रपंच का पर्दाफाश करने वाली सपाट बयानी है। वर्ण और लिंग गत विषमता मानव सभ्यता के विकास में बड़ी बाधा है, यह दलित विमर्श का मुख्य मुद्दा है दलित के कलंक से मुक्ति द्वारा द्वारा मानव समाज में समानता बंधुत्व मर्यादा और सम्मान के बाद पैदा करना उनका उद्देश्य है। अपनी दलित-गलित स्थिति के प्रति पीड़ा, विषमता के प्रति आक्रोष और व्यवस्था के प्रति विद्रोह ही दलित साहित्य प्राथमिक स्वर है। इस सत्र में डॉ. अल्पना शर्मा ने कहा कि भारतीय वेद शास्त्रों व पुराणों के अध्ययन से पता चलता है कि अस्पृष्यता या अछूत जैसा कोई उदाहरण नहीं मिलता। उन्होंने अपने पत्र वाचन में कहा कि इसी समाज में एक तबका ऐसा भी है जो दलितों को जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल कर रहा है। दलित समस्या के समाधान के लिये समस्या को समझना होगा सामाजिक संवेदना से जोड़ना होगा। एक दलित 100 करोड़ का मालिक है तब भी दलित है। आईपीएस तब भी दलित है। प्रोफसर है तब भी दलित, और तो और रामनाथ कोविद राष्ट्रपति बने तब भी कहा गया कि दलित राष्ट्रपति है । इसके सामाजिक उत्थान के लिये विचार करने की आवश्यकता है। उन्हें सामाजिक सम्मान मिलना चाहिए, विकास के साथ पहचान होनी चाहिये। वैदिक परम्परा से जीने का प्रयास करना चाहिये। 
डॉ. पूराराम ने कहा, मैं समझता हूँ समाज में समरसता और दलितों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना और इनके प्रति सम्मान का दृष्टिकोण अपेक्षित है। राजनीतिक पार्टियाँ अपना उल्लू सीधा करने के लिये दलितों का उपयोग कर रहीं है । दलितों का भला न कर अपना स्वार्थ पूरा कर रहीं है।


डॉ. विदुषी आमेटा ने अपने पत्र वाचन में कहा, हम स्त्री, दलित, आदिवासी या अन्य किसी भी विमर्श की चर्चा करें, विमर्श का अंतिम सोपान होगा-मनुष्य का आचरण। जब तक आचरण पतनोन्मुखी है, दुराचरण ग्रसत है, तब तक  चहुँमुखी समस्याएँ व्याप्त रहेंगी और विमर्श के नये विषय संज्ञान में आते रहेंगे । 
डॉ. कल्पना मौर्य-दलित विमर्श के कारण जो साहित्य निर्माण हुआ वह अनेक दृष्टियों से विशेष रहा है यह साहित्य एक व्यक्ति द्वारा निर्मित होते हुए भी जनसमूह मन को प्रकट करता है । अर्थात् दलित साहित्य में व्यक्ति नहीं समाज का प्रकटीकरण होता है। दूसरे यह साहित्य में प्रकट होती है । तीसरे इस साहित्य ने अन्याय अत्याचार के साथ नये अनुभवों का मिश्रण करने का कार्य किया है । इस प्रकार दलित विमर्श का आधार लेकर जिस दलित का निर्माण हुआ वह बहुत बड़ी उपलब्धी है। इससे सामाजिक परिवर्तन होगा, संकीर्णता के स्थान पर मानवता की सच्ची प्रतिक्रिया होगी । प्रत्येक मनुष्य विशेषकर दलित वर्ग अपनी युगति हीनता, अत्याचार शोषण से मुक्ति पाकर यथाचित स्थान पा सकेंगे। 
अन्तः में दलित उन्मूलन के कुछ सुझाव 
1. स्वस्थ सामाजिक वातावरण का निर्माण करने के लिये लोगों की मानसिकता एवं मनोवृतियों को बदलना होगा  । 
2. जाति प्रथा के स्वरूप में परिवर्तन के लिये शिक्षा और प्रचार के द्वारा धीरे-धीरे बदलाव लाना होगा । 
3. समाज सुधारकों द्वारा ग्राम का विकास नवीन आधारों पर किया जाना चाहिये । 
4. घृणित व्यवसायों की संख्या कम होने के साथ मशीनीकरण द्वारा दूर किया जाना चाहिए। क्योंकि यह अपवित्र होता है। 
5. शारीरिक श्रम के प्रति आदर का भाव विकसित किया जाना चाहिए  ।
6. प्रौधेगिक शिक्षा द्वारा हरिजनों का आर्थिक और सामाजिक सुधार कर अंधविश्वास और अज्ञानता को दूर किया जा सकता है ।,
7. स्वस्थ और नैतिक स्तर के विकास के लिये आवास संबंधी योजनाओं के तेजी से लागू किया जाना चाहिए। 
8. मनोरंजन की व्यवस्था समुचित रूप से हरिजनों के लिये करनी होगी । 
9. सामाजिक सुरक्षा के कार्यों की समुचित व्यवस्था हरिजनों के लिये करनी होगी और इसे तीव्रता से  बल देना होगा । 
10. सभी सार्वजनिक उत्सवों, त्यौहारों मेला आदि में प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये । यह कार्य समाज सुधारकों नगर व ग्राम देवताओं की सहायता से संभव है। 

21 वीं सदी और स्त्री विमर्श
इस तकनीकि सत्र की अध्यक्षता डॉ. संदीप अवस्थी की अध्यक्षता में हुई सन्दर्भ व्यक्ति के रूप में डॉ. विष्णुदत्त जोशी एवं प्रतिवेदक के रूप में डॉ. रंजीता बैद ने की।
इस सत्र में डॉ. मंजू शर्मा, डॉ. कंचन शर्मा, डॉ. शीतल चोटिया, डॉ. अल्पना शर्मा ने अपना पत्र वाचन किया। यह संगोष्ठी कुछ उद्देश्यों को लेकर चली जैसे-दलित, आदिवासी और जनजाति, हरिजन और आदिकाल से पृथ्वी पर निवास करने वाली स्वतंत्र जाति जिस जंगल, पृथ्वी की रक्षक और संरक्षक के रूप में निवास कर रही थी। जिसे अपनी ही भूमि से विस्थापित किया गया इन्हें अपनी भूमि पर वापिस लाना होगा। इसमें दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, जनजाति विमर्श और थर्ड जेंडर विमर्श पर गहन चिंतन और मनन हुआ। डॉ. संदीप अवस्थी ने कहा कि बिना पुरूष के स्त्री की कल्पना नहीं की जा सकती। उनका कहना था कि स्त्री माँ, बेटी, बहन और भार्या इन चार रूपों में वह अपने अस्तित्व का निर्वाह पुरूष के साथ करती है।
डॉ. विष्णुदत्त जोशी :- आपने स्त्री विमर्श पर स्वयं द्वारा किये गये शोध कार्य के सन्दर्भ मे उल्लेख किया कि 21 वीं सदी  में स्त्री विमर्श के सन्दर्भ में जो उपन्यास आये है। उनके प्रकाश में आपने अपना शोध कार्य किया। आपने अलका सरावगी के उपन्यास का उदाहरण देते हुए स्त्री स्थिति का उल्लेख किया। आपने विभिन्न उपन्यासों का उल्लेख करते हुए वैश्विक स्तर पर स्त्रियों की स्थिति को बताया।
डॉ. अविनाश पारीक :- आपने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिला की सक्रियता विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। आपने बताया कि किसी राष्ट्र की उन्नति उस राष्ट्र की महिला की उन्नति से जुड़ी हुई है। मानव के व्यक्तित्व निर्माण में स्त्री की महती भूमिका है। आपने बताया कि भारतीय वैदिक परम्परा में सोलह माताओं के बारे में बताया गया है। आपने महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा को विस्तार से बताया। आपने बताया की नारीवाद की विस्तृत व्याख्या पर बल दिया जाए।
डॉ. कंचन शर्मा :- आपने अपने वक्तव्य में बताया कि ऐतिहासिक रूप से चल रही लैंगिक भेदभाव को मिटाने के लिए हमें दृढ़ इच्छा शक्ति को अपनाने की आवश्यकता है। आपने कहा कि स्त्री प्रारम्भ से ही अनवरत रूप से हर दृष्टि से शोषित रही है। आपने विभिन्न लेखकों के साहित्य में उल्लेखित महिला व्यथा को व्यक्त किया। स्त्री विमर्श आज वैश्विक मुद्दा है।
डॉ. शीतल चोटिया :- आपने समकालीन साहित्य में स्त्री विमर्श विषय पर विचार व्यक्त किया। आपने वैश्विक सन्दर्भ में स्त्री विमर्श को भरतीय चिन्तन में स्त्री विमर्श से अलग बताया। आपने हिन्दी साहित्य की गद्य एवं पद्य विद्या में लिखे स्त्री विमर्श पर विस्तार से प्रकाश डाला समाज में व्याप्त लैंगिक भेद-भाव को दूर करने पर बल दिया।
अध्यक्षता उद्बोधन (डॉ. सदीप अवस्थी) :- आपने बताया कि भारत में स्त्री विमर्श सदियों पुराना है, गार्गी, मैत्रयी एवं भारती आदि विदुषियों के बारे में विस्तार से बताया। मध्यकाल में मीराबाई के माध्यम से स्त्री विमर्श पर विस्तार से बाताया। आपने बताया कि एक स्त्री अपने जीवन काल में चार पुरूषों के सम्पर्क में आती है - पिता, भाई, पुत्र एवं पति। आपने स्त्री विमर्श की पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत की।
चतुर्थ सत्र - 21 वीं सदी और जनजाति विमर्श इस तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. कंचन शर्मा ने की संदर्भ व्यक्ति डॉ. शीतल चोटिया एवं प्रतिवेदक डॉ. अल्पना शर्मा ने की । चंद्रकान्त देवतले ने अपने पत्र वाचन में कहा समकालीन कविता में दलितों, आदिवासियों और आम जनता के प्रति सहानुभूति का स्वर कवियों ने मुखर किया है । पूंजीवादी व्यवस्था से संर्घष करती है और कवि ने शोषितों के हक में अपनी बात स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है । सन् 1960 के दशक के बाद समकालीन काव्यधारा में अर्थ बढ़ता कर्ज, पेट्रोलियम पदार्थों में बढ़ती कीमते, आदि के कारण जनमानस में जटिल समस्याऐं पैदा हुई है । उच्च अध्ययन शिक्षा संस्थान मानित विश्वविद्यालय, गां.वि.मं. सरदारशहर के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के हिन्दी विभाग में आयोज्य राष्ट्रीय सेमीनार के तृतीय सत्र में निम्नलिखित वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किये। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. संदीप अवस्थी ने की।
श्री सुमेर सिंह :- आपने ''21 वीं सदी और स्त्री विमर्श'' विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि स्त्री विमर्श 1950 से ही प्रारम्भ हुआ है। ऐतिहासिक पृष्टभूमि में इस विषय पर चिन्तन करने की आवश्यकता नहीं थी। आधुनिक लेखिकाओं ने इस विषय को अपने साहित्य में उजागर किया। इन्होनें अपने साहित्य में महिलाओं के प्रति सहानुभूति एवं स्वानुभूति पर प्रकाश डाला है। जयन्तीरथ की कविता का उल्लेख करते हुए महिला के प्रति निम्न सोच परिवार से प्राप्त होती है। महादेवी वर्मा के अनुसार स्त्री के प्रति सोच में गिरावट आधुनिकता के कारण आई है। स्त्री और पुरूष एक-दूसरे के पूरक है। ये पूरकता ही पूर्णता को प्राप्त करता है।
21 वी सदी और आदिवासी विमर्शः-
पंचम सत्र - तकनीकी सत्र की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष मंजू शर्मा ने की तथा संदर्भ व्यक्ति के रूप में डॉ. सुन्दरम शांडेल्य ने की। प्रतिवेदक डॉ. कैलाश पारीक। इस सत्र में डॉ. उमा सैनी ने कहा आदिवासी समाज में विद्रोह का प्रारंभ ब्रिटिश शासन की शोषण ग्रस्त व्यवस्था का परिणाम माना जा सकता है। आदिवासी उन्हें माना जाता है जो जंगल में निवास करते है असभ्य है, लेकिन ऐसा नहीं है इनकी अपनी एक भाषा है, संस्कृति है, परम्पराऐं, व्यवहार है, धर्म है, जो सम्मानीय है। इन सभी तत्वों पर विमर्श की आवष्यकता है । ताकि आदिवासी लोग भी सम्मानपूर्वक समाज में स्थान प्राप्त कर सके। 21 वीं सदी में आदिवासी विमर्श केन्द्र में है। इसलिये इनकी संस्कृति सभ्यता, भाषा, साहित्य दर्शन आदि पर विमर्श की अति आवश्यकता महसूस की जा रही है। डॉ. मंजू शर्मा ने कहा कि - आदिवासियों को उनकी ही अपनी जमीन से जंगल से उन्हें विस्थापित कर दिया गया । उन्हें अपनी ही भूमि पर बसाना होगा आदिवासियों को उनके समूचे संस्कृति को मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास कर उनका जीवन सुजलाम, सुफलाम बनाए।
21 वीं सदी और थर्ड जेन्डर विमर्श के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. देवेन्द्र मोहन जी ने की। तथा संदर्भ व्यक्ति डॉ. सुनीता अवस्थी ने की। डॉ अवस्थी ने कहा समलैगिता एक प्रकार से थर्ड जेन्डर का प्रकार है। इन्हें मध्य प्रदेश में हिजड़ा और किन्नर जाति कहा जाता है। इनकी अपनी समस्यायें है इन्हें समाज सम्मान से नहीं देखता इन्हें मुख्य धारा से जोड़ना समाज के हित में है। डॉ. धर्मराज पंवार ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
सप्तम् सत्र (21वीं सदी और अन्य विमर्श - पर्यावरण जल संरक्षण एवं सांस्कृतिक विमर्श)
इस जल संरक्षण एवं पर्यावरण विमर्श के तकनीकी सत्र में डॉ. संदीप अवस्थी के स्थान पर डॉ. हंसा शुक्ला एवं संदर्भ व्यक्ति के रूप में डॉ. सरीता शर्मा एवं रिपोर्टिंग में डॉ. अल्पना शर्मा। डॉ. कैलाश पारीक, डॉ. रंजीता बैद, डॉ. सुनील कुमार एवं डॉ. रामावतार ने अपने शोध पत्रों का वाचन किया। इसके पश्चात 15 व्यक्तियों का एक दल उ.अ.शि.सं. (मानित विश्वविद्यालय), गां.वि.मं. के परिसर में गए जहाँ प्रवेश के साथ प्रत्येक छात्र एक पौधा लगाता है और जैसे-जैसे पौधा बढ़ता है उसके साथ ही पौधें का रक्षण एवं संरक्षण पूर्ण होने पर उसकी डिग्री विद्यार्थी को दी जाती है। वर्षा के जल संग्रहण के लिए छोटे-बड़े तालाबों का निर्माण किया गया है। आवासीय कालोनियों में भी जल संग्रहण के लिए कुण्ड बनाए गए है। जिसमें संग्रहित पानी को पीने के लिए एवं फलदार वृक्ष लगाने के लिए उपयोग किया जाता है। संस्था में ही जैविक कृषि की जाती है जिसमें रसायन का उपयोग नहीं किया जाता। यहाँ पर खाद एवं बीज संस्था द्वारा ही निर्मित होते है। इनकी किस्म देशी होती है। खाद गौ-मूत्र एवं गोबर और नीम की पत्तियों  से बनाई जाती है। गोबर से गोबर गैस प्लांट बनाए जाते है जिससे रसोई गैस एवं बिजली का उत्पादन होता है। इन सभी पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया है। इसमें जो फल और सब्जियाँ उगाई जाती है। वे शारीरिक स्वास्थ्य दृष्टि से उपयोगी है।
अष्टम् सत्र (समापन-सत्र)
इसकी अध्यक्षता श्री हिमांशु दूगड़ ने की। समापन सत्र में कुलपति डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. देवेन्द्र मोहन रजिस्ट्रार श्री जितेन्द्र पारीक, डॉ. मनीषा वर्मा, डॉ. सरीता शर्मा, डॉ. के. रानी लक्ष्मी सभी उपस्थित थे। डॉ. दिनेश कुमार ने संगोष्ठी की सफलता पर हिन्दी विभाग एवं सभी आयोजन समितियों को धन्यवाद दिया। डॉ. हंसा शुक्ला ने डॉ. कल्पना मौर्य के समन्वय में पूरी टीम के सफल आयोजन पर बधाई दी। उन्होनें कहा कि इस तरह की संगोष्ठीयां निरंतर होनी चाहिए। जिससे समाज में व्याप्त ऊंच-नीच का भेद-भाव समाप्त हो सके। डॉ. संदीप अवस्थी एवं डॉ. टी.जी. विकार्या ने राष्ट्रीय संगोष्ठी में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, जनजातिय विमर्श एवं थर्ड जेंडर विमर्श को 21वीं सदी का विमर्श बताया। उन्होनें कहा की वर्तमान में इसकी आवश्यकता बहुत है। कार्यक्रम के अन्त में संयोजिका डॉ. कल्पना मौर्य ने सबका आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होनें कहा कि इस तरह के सेमीनारों का आयोजन हिन्दी विभाग द्वारा निरंतर किए जाऐंगें इसके लिए मैं वचनबद्ध हूँ।
सेमीनार समीक्षा 
इस प्रकार हम कह सकते है 21वीं सदी को प्रांरभ हुऐ दो दशक हो गये है । इस सदी में साहित्य को लेकर जो परम्परा का निर्वाह एवं नये का स्वीकार हुआ है इसे देखना इस सदी में आवश्यक हो गया है। अब तक हमने स्थापित साहित्य एवं मान्यताओं को लेकर काफी चर्चा बहस की है कुछ नए साहित्य एवं विमर्श को लेकर चर्चा होना समय की मांग है। इसी हेतु 21 वीं सदी के हिन्दी साहित्य के सृजनात्मक एवं सैद्धान्तिक पक्ष पर विचार कर लेना आवश्यक है। सद्यस्थिति में भारतीय जनमानस को जिस घटना ने सबसे अधिक प्रभावित किया है वह है भूमंडलीकरण अथार्त वैश्वीकरण और भूमण्डलीकरण से अपने उपभोक्तावाद, बाजारवाद एवं दूरसंचार में भूमंडलीकरण से प्रभावित भारतीय व्यक्ति की जीवनशैली एवं मीडिया के चौतरफा आक्रमण के कारण वाचन संस्कृति तेजी से कम हो रहीं है । इसी कम होती वाचन संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु संगोष्ठीयों का आयोजन होना समय की मांग है। 21 वीं सदी आधुनिक साहित्य में सर्जनात्मकता की दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण कहीं जा सकती है। उक्त अवधि में विविध विमर्शोर्ं ने बहस मुवाहिसे को नए तेवर के साथ आगे बढ़ाया, वही बाजारवाद/उपभोक्तावाद की संस्कृति ने हिन्दी साहित्य में अनेक अवधारणाओं को लेकर वाद-विवाद-संवाद का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे महत्वपूर्ण पक्षों पर चर्चा परिचर्चा, परिसंवाद, संगोष्ठी कार्यशाला आदि साहित्यिक संवाद को आगे बढ़ाने में बहुत प्रभावी एवं कारगर माध्यम माने जाते है  । 21 वीं सदी की रचनात्मकता को लकर हिन्दी साहित्य रचना के विविध महत्वपूर्ण पक्षों पर सार्थक हस्तक्षेप करने वाला अपनी अपनी तरह का यह एक मौलिक सेमीनार कहा जा सकता है। 21 वीं सदी के हिन्दी साहित्य को विभिन्न कोनों से समझने हेतु इस संगोष्ठी को एक आधार मानकर चलने में कोई दो राय नहीं हो सकती। 
उत्तरआधुनिकता फिर उत्तर संरचनावाद और विखंडनवाद के प्रभाव स्वरूप पाठ के विखंडन का नया दौर शुरू हुआ इसी दौर में नकस्लवादी आलोचना, नारी विमर्श, दलित विमर्श आदिवासी विमर्श, सांस्कृतिक ऐतिहासिक बोध जैसी विविध विमर्श धाराएं विकसित हुई । केन्द्र के परे जाकर परिधि को लेकर नवविमर्श की जद्दोजहद होने लगी । ऐसे समय में मनुष्य और साहित्य की फिर से बहाली पर भी बल दिया जाने लगा । पिछले दो तीन दशकों में एक साथ बहुत से नवविमर्शोर् में साहित्य, संस्कृति और कुल मिलाकर कहें तो समूचे चिंतन जगत को मथा है । ये विमर्श साहित्य को देखने की नई दृष्टि देते है, वहीं इनका जैविक रूपायन रचनाओं में भी हो रहा है। हिन्दी साहित्य में उभरे प्रमुख विमर्शोर्ं में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, वैश्वीकरण को देखा जा सकता है।
अन्त में हिन्दी साहित्य के भविष्य की चिंता, क्या सदी में हिन्दी साहित्य खतरे में पड़ गया है। प्रबोधन जागृति और मनोरजंन के विविध माध्यम उपलब्ध होने से साहित्य की अनदेखी हो रहीं है। आनेवाली पीढ़ी में पठन-पाठन की कमी को इसी परिपेक्ष्य में देखना होगा। पुस्तक खरीदकर पढ़ने की प्रवृति कम हुई है, जो चिंता का विषय है। इलेक्ट्रॉनिक प्रसार माध्यमों ने भी इस प्रवृत्ति को हवा दी है। आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करने की दृष्टि से पठन् पाठन की प्रवृत्ति को बढ़ाना आवश्यक हो गया है। संक्षेप में हिन्दी साहित्य के विभिन्न विमर्शोर्ं वैश्वीकरण एवं हिन्दी साहित्य के भविष्य को लेकर संगोष्ठी काफी कुछ महत्वपूर्ण रहीं । 

रिपोर्ट-डॉ. कल्पना मौर्य

संगोष्ठी समन्वयक
हिन्दी विभाग अध्यक्षक

 
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