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हाइकु
December 15, 2019 • अंकुर सहाय 'अंकुर' • दोहा/छंद/हायकु

 *अंकुर सहाय 'अंकुर'*
तुम्हारे बाद 
बेबस यादें बोलीं 
लौट आ जाना 
***
मुस्कुराकर
बरस गई आंखें 
कोई न जाने 
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आंख बिचारी
पथ निहार रही
 मन चंचल ।
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पेट के लिए
बंधुआ मजदूर
नहीं बनना ।
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प्रेम के पन्ने
कोरे रह ही गए
ख़्वाब अधूरे ।
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आज की सीता
लेना चाहें राम की
अग्नि परीक्षा
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प्यार के मारे
सुहागन निंदिया
स्वप्न कुंवारे ।
***
पायल बजी 
बावरा मन चला
गांव की ओर ।।
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प्यार के बोल
मन की गांठें  खोल
हैं अनमोल।।
***
बोलते नेता 
मारी जाती जनता 
चलते जूते ।
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 *अंकुर सहाय"अंकुर"
 खजुरी(अहरौला), आजमगढ़
 
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