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गुरू पर्व
July 3, 2020 • रामगोपाल राही  • कविता

*रामगोपाल राही 
 
भारतीय संस्कृति में उत्तम ,
गुरु शिष्य की परंपरा |
गुरु शिष्य के संबंधों  से, 
पावन  थी यह वसुंधरा ||
 
ज्ञान का दाता भाग्य विधाता ,
सद् गरू  मिलना मुश्किल है |
गुरु मिले तो ज्ञान मिले सच ,
दोनों मिलना मुश्किल है ||
 
आज गुरु  की गरिमा घट गई ,
पहले जैसी बात नहीं |
जीवन शैली शिष्यों की भी ,
बदल गई वो बात नहीं   ||
 
ईश्वर के प्रतिरूप गुरु ,
पाते थे सम्मान बड़ा |
चरित्रवान गुणवान गुरु का ,
घर घर में था मान बड़ा ||
 
निर्मल जीवन शैली वाले ,
गुरु अनोखे होते  थे |
शिष्यों के हित साधन में ही ,
रहते वक्त ना खोते थे ||
 
 नकली गुरु के रुप अनेकों ,
ठौर ठौर पर मिलते हैं |
कहीं पर देखो अपवादों से ,
घिरे  गुरु भी मिलते हैं ||
 
 ढोंगी  साधु छले अनेकों ,
 कैसे-कैसे ग्रुरू कहें |
 वैभव के गुलाम अधिकतर ,
मन ना माने गुरु कहें ||
 
 
 चार वेद के ज्ञाता खुद को ,
मान भागवत कथा करें |
गुरु बता कर खुद अपने को ,
भेंट अनेकों लिया करें ||
 
ज्ञान दीक्षा व मोक्ष का सच ,
पथ  गुरू  बतलाता था |
सच्चा गुरु शिष्य का समझो 
 पथ प्रदर्शक होता था ||
 
अंधे गुरु के अंध चेले ,
ज्ञान मिले तो कहाँ मिले |
हो दोनों का पतन मान लो ,
नैतिक पथ  -छोड़ चले||
 
पहले जैसे गुरु वस्तुतः
आज खोजना मुश्किल है
जगा चेतना  दे शिष्यों   में ,
गुरु का मिलना मुश्किल है ||
 
गुरु पर्व   पर गुरुओं  का ,
सम्मान हुआ करता था |
सर्व समाज गुरुओं से ही 
 सच ज्ञान लिया करता था ||
*पो0लाखेरी,जिला बूँदी (राज)
 

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