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गिरवी घर की मुस्कानें
May 20, 2020 • अशोक 'आनन' • गीत/गजल
*अशोक 'आनन'
 
कोरे काग़ज पर लगाएं 
बोलो -
कितने और अंगूठे ?
 
गिरवी 
खेल , खिलौने , सपने 
गिरवी -
घर की मुस्कानें ।
पीड़ा के 
फुटपाथों पर बैठे 
आंसू की -
खोल     दुकानें ।
 
भाग्य -
जन्म से रूठा हमसे ।
अपने भी -
अब लगते रूठे ।
 
खुशियों को तुम 
कभी
झोपड़ियां -
अभावों की  भी दिखलाना ।
भूख़ों की 
इन बस्तियों में  
बदहज़मी से -
न जी मिचलाना ।
 
भूख़ -
हमें यहां रोज़ दिखाती ।
सुबह - शाम -
कई खेल अनूठे ।
 
*अशोक 'आनन',मक्सी जिला - शाजापुर ( म. प्र.)
 

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