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घटाएं सावन की
July 21, 2020 • ✍️अशोक 'आनन'

    

✍️अशोक 'आनन'
 
गरजें - बरसें-
घटाएं सावन की ।
 
पिया  गए परदेश -
हमारे ।
कैसे -
विरह रात गुज़ारें ?
 
आस पूर्ण कब होगी -
मन की ?
 
हम हैं -
नदिया के दो किनारे ।
मिले कभी न -
कोशिश   कर   हारे ।
 
कब बांचोगे तुम -
भाव नयन के ?
 
हर  बांध  टूट   चुका -
सब्र  का ।
गुज़र चुका मधुमास -
उम्र का ।
 
भली लगी अब -
सुधि सजन की ।
 
कभी    लौट    आता     है -
वक़्त ।
शिलाएं पिघल जाती हैं जब -
सख़्त ।
 
सच हो जाती है जब -
बात सपन की ।
 
*मक्सी,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)
 

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