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घर- घर आदमख़ोर
April 17, 2020 • अशोक 'आनन • दोहा/छंद/हायकु

                                  
*अशोक 'आनन'
 
बस्ती - बस्ती खौफ़ है ,  घर - घर आदमख़ोर ।
ज़ान बचाकर आदमी ,  अब  जाए किस ओर ?
 
गांवों  में  कर्फ़्यू  पसरा ,  हुईं  गली   श्मशान ।
सुबह  जहां  वीरान - सी ,  शामें  हैं  सुनसान ।
 
बंद मिलीं ये खिड़कियां , बंद  मिले सब द्वार ।
अब  तो  सारा  शहर  है , दहशत  से  बीमार ।
 
सूने  -  सूने  शहर  हैं , उजड़े  -  उजड़े  गांव ।
दिल में  सबके आज हैं ,  शक़  के गहरे घाव ।
 
चुप्पी   की  हैं  बस्तियां ,  सन्नाटों   के   गांव ।
दहशत के  ये रतजगे ,  बसा  हृदय अलगाव ।
 
आंखों  में  हैं  दहशतें , दिल  में  सबके  घाव ।
जब  से   बस्ती  में  पड़े , ' कोरोना ' के  पांव ।
 
'कोरोना ' के  आतंक  से , संशय  में  है ज़ान ।
बंद   पड़े   बाज़ार  सब  ,  सहमा  है   इंसान ।
  
*अशोक 'आनन
 मक्सी जिला - शाजापुर ( म.प्र.)

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