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घर बुनता रहा जाले
June 23, 2020 • अशोक 'आनन' • गीत/गजल
*अशोक 'आनन'
 
घर बुनता रहा -
नित नए जाले ।
 
अपनों    ने   फिर    रचा -
एक और चक्रव्यूह ।
अभिमन्यु - सा मैं फंसा -
कांपी न उनकी रुह ।
 
फिर वही पांसे -
फिर वही चालें ।
 
बंधा था जिस डोर से -
वह डोर टूट गई ।
जितनी  भी  थीं  राहें    -
वे पीछे छूट गई ।
 
तड़प रहे शब्द -
अधर जड़े ताले ।
 
ज़िंदगी में लगेंगे फिर -
खुशियों  के  मेले ।
आंसुओं  से  ये  नयन -
सुबह - शाम खेलें ।
 
ग्रीष्म - दुपहरी -
रिस रहे छाले ।
*मक्सी,जिला - शाजापुर ( म . प्र .)
 

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