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गर्मी की भट्टी
June 1, 2020 • अशोक'आनन' • गीत/गजल

*अशोक'आनन'
 
सूरज ने 
गर्मी   की   भट्टी -
फ़िर         सुलगाई ।
 
थार - सा  तप  रहा -
बदन का पोर - पोर ।
पानी  का  कहीं भी -
दिखे  न ओर - छोर ।
 
प्यासे कुओं की 
ज़ान       पर -
अब    बन      आई ।
 
आत्म - घात  पर   हैं  -
उतारू प्यासी नदियां ।
ग्रीष्म  का है  आतंक -
बस्ती   हुईं    भूतिया ।
 
लू का है साया
आंख      ज़रा -
न      लग     पाई ।
 
पेड़ों    पर   झुलसे -
पांव  पखेरुओं   के ।
दोपहरिया    बनाए -
रेखा - चित्र धुंओं के ।
 
धधकती दोपहरी -
हवा -
झुलसकर     आई ।
*मक्सी ,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)
 

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